खीर....
क्या तुम्हे याद हैं वो दिन
जब मैं पहली बार
इस घर मैं आई थी..
कुछ डरी सी
कुछ सहमी सी
अपनी सांस भी तब
लगती पराई थी
मुझे अपनी पायल की आवाज़ भी
अनजानी लगती थी..
और कंगन की खनक भी
बेगानी लगती थी.....
लगते थे सब रिश्ते पराये..
सिर्फ तुम्हारी उपस्थिति
रूहानी लगती थी...
कैसे उठूँ? कैसे बैठूं ?
कैसे बोलूँ ? कैसे चलूँ ?
बस इसी उधेड़ बुन मैं
पूरा दिन बीत जाता था
और बस मुझे छोड़ कर
घर में हर कोई बतियाता था
हा हा ....तुम्हे याद है ,
जब मैंने पहली बार खीर बनाई थी
तुम्हे परोसते हुए
मैं थोडा शरमाई थी
तुम कितने प्रेम से
मुझे देखते हुए
खीर खा रहे थे
और शरारत से
कुछ मुस्कुरा रहे थे
नयन भीग गये मेरे
जब मैंने उस कटोरी
से थोड़ी खीर खाई
उफ़!!!!!
खीर में नमक था
आज भी जब खीर बनाती हूँ
तो उस दिन को याद कर
मन ही मन मुस्काती हूँ
उस दिन इस खीर ने ही तो
मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम का
पहला बीज बोया था
सिम्मी मैनी
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