तानपुरा
सुबह का वक़्त है
रियाज़ कर रही हूँ मैं
अपने हाथों में
एक नन्हे फ़रिश्ते की तरह
थोडा कसती हूँ
तार उसके
और अब तार छेड़ने पर
आवाज़ निखर जाती है
भर जाती है
अंतर आत्मा
उस मीठी गूँज से
अब समझी प्रभु
तुम क्यों मेरे दिल के तार
कसते और खींचते रहते हो
में भी तो
तुम्हारे हाथों का
तानपुरा हूँ
सिम्मी मैनी
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