Saturday, 11 February 2012

लाल फ्राक ........

         
     लाल फ्राक 

आज अलमारी खोलते ही
लाल ज़री की साड़ी हाथ आ गयी
उसे देख बचपन का वो लाल फ्राक 
याद आया........
जिसके लिए ज़मीन आसमान
एक कर दिए थे मैंने
आंसुओं के दरिया बहा दिए थे
दो दिन अनशन किया था
और मौन व्रत भी रखा था
तेज़ बुखार में तपने लगी थी मैं

पापा आफिस से आये
और बोले
इतना तेज़ बुखार
माँ लाल पीली हो कर बोली
लाड का बुखार है
रानी साहिबा को 
लाल फ्राक चाहिए
हा हा .....तो ले दो ना
माँ के माथे पर चिंता की लकीरें 
चीख उठीं 
पर आपका कोट ?
अब सर्दी गयी
अगले साल देखेंगे

मेरी आँख नाम हो गयी
और कांपती उंगलियाँ 
नंबर मिलाने लगीं 
हेलो ...........पापा 
I AM SORRY

सिम्मी मैनी 

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