Friday, 25 November 2011

मेरे बाऊ जी

            मेरे बाऊ जी
आज भी याद मुझे,
मैं जब रोती थी,
तो घोडा बन जाते थे बाऊ जी,
मुझे साईकिल चलाना,
 सिखाते थे बाऊ जी,
मेरी तोतली बोली सुन ,
फूले नहीं समाते थे बाऊ जी,
जब मम्मी को गुस्सा आता था,
तो डांट के कहर से बचाते थे बाऊ जी,
हर शाम हारमोनियम पर ,
एक गीत सिखाते थे,
और मेरे बेसुरा गाने पर भी,
पीठ थपथपाते थे बाऊ जी,
जब मैं पिठ्ठू खेलने को,
 फीटियां ढूँढा करती थी ,
तो बड़े पत्थर को तोड़ ,
फीटियाँ बनाते थे बाऊ जी,
जब मेरा घर का काम करने का,
मन नहीं होता था तो,
बहाने से पास बिठाते थे बाऊ जी,
हर रोज़ खट्टी इमली,बुड्डी माई का चाटा,
और गली के पापड़ मम्मी से छुप कर,
खिलाते थे बाऊ जी,
जब कॉलेज बस मैं नहीं जाना होता था,
तब ऑटो के पैसों का जुगाड़ कराते थे बाऊ जी,
सदा सुखी रहो ,
बस यह एक लाइन ,
सदा  दोहराते थे बाऊ जी,

पर आज कोई हाथ सुरीला गाने पर भी ,
पीठ उस तरह नहीं थपथपाते ,
आज कोई मिर्चे नहीं वारता मुझ पर,
और ना ही कोई झूठी तारीफ़ करता है,
क्या आप उन्हें ढूँढने में ,
मेरी मदद करेंगे,

सफ़ेद पठानी सूट,
और तिलेदार जुत्ती,
कुल्ले वाली पगड़ी,
हाथ में सागवान की छड़ी ,
आँखों पर चश्मा ,
लम्बा कद और गोरा रंग,
हीरो से दिखते हैं बाऊ जी,
अगर कहीं मिल जाएँ ,
तो कह दीजियेगा कि,
सिम्मी उन्हें सालों से,
ढूँढ रही है.....

सिम्मी मैनी 

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