Thursday, 17 November 2011

कविता करार देते हैं

कौन कहता है कि मैं कविता लिखती हूँ,
कहाँ जानती हूँ मैं व्याकरण की बारीकियां,
और कहाँ है मुझे ? गूढ़ शब्दों का ज्ञान,
नहीं आते मुझे सजे संवरे आलंकृत शब्द,
और कहाँ पढ़े हैं मैंने वेद पुराण ?
मेरा तो दिल बस यूँही इशारा करता है हाथ को,
और हाथ झट से कलम उठा लेते हैं,
बिखर जातें हैं भावनाओं के मोती कागज़ पर,
और आप उसे कविता करार देते हैं l

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