आत्मविश्वास
शिथिल होती काया
बैठने की जगह ढूँढते पैर
सोचती हूँ
इतना कैसे थक गई?
नीचे नज़र जाती है
बैठने की जगह ढूँढते पैर
सोचती हूँ
इतना कैसे थक गई?
नीचे नज़र जाती है
आश्चर्य होता है खुद पर
मैं इतना ऊपर चढ़ आई
मैं इतना ऊपर चढ़ आई
जीवन कि चढाई का सफ़र
साफ़ नज़र आता है
साफ़ नज़र आता है
दूर से झांकते नज़र आते हैं
जीवन के सभी पड़ाव
जो मैंने तय किये
सफ़र की शुरुवात में
कभी सोचा न था कि
इतनी हिम्मत
जुटा पाऊँगी
कभी ख्याल न आया था कि
इस ऊँचाई को छू पाऊँगी
अतीत के थपेड़े
आज भी
मन कि मज़बूत नींव
हिलाना चाहते हैं
कटु यादों की तूफानी लहेरें
आज भी
प्रेम और शांति के बन्धनों को
तोड़ने के लिए बेताब हैं
पर मैं कितनी
शांत और अटल हूँ
बालों कि सफेदी और
चेहरे की हल्की झुरियां
एहसास दिलाती हैं कि
समय कितना बलवान है
पर वक़्त की
तेज़ तलवार के आगे
मेरा आत्मविश्वास
बन कर खड़ा है
एक मज़बूत ढाल
जीवन की किताब के
कई पन्नों पर पड़ी है
दुखों और मुसीबतों की धूल
पर उनके बीच चमक रहा है
मेरा आत्मविश्वास
एक दिव्य शक्ति के समान
इसकी तेज़ रोशनी में
मैं नहा जाती हूँ
और वो रोशनी
चुपके से
मेरे कानों में कहती है
चल उठ.....
अभी तो शिखिर को
छूना है.....
यह भी तेरे जीवन का
एक पड़ाव है
अपने लक्ष्य प्राप्ति की
कल्पना से
मन विभोर हो उठता है
अपनी गरिमा को
महसूस करती हूँ मैं
और अपने ही
आत्मविश्वास के आगे
सर श्रद्धा से झुक जाता है
नमन करती हूँ मैं उसे
और पैर खुद्बाखुद
मंजिल की और
कूच करते हैं .......
सिम्मी मदन मैनी
जो मैंने तय किये
सफ़र की शुरुवात में
कभी सोचा न था कि
इतनी हिम्मत
जुटा पाऊँगी
कभी ख्याल न आया था कि
इस ऊँचाई को छू पाऊँगी
अतीत के थपेड़े
आज भी
मन कि मज़बूत नींव
हिलाना चाहते हैं
कटु यादों की तूफानी लहेरें
आज भी
प्रेम और शांति के बन्धनों को
तोड़ने के लिए बेताब हैं
पर मैं कितनी
शांत और अटल हूँ
बालों कि सफेदी और
चेहरे की हल्की झुरियां
एहसास दिलाती हैं कि
समय कितना बलवान है
पर वक़्त की
तेज़ तलवार के आगे
मेरा आत्मविश्वास
बन कर खड़ा है
एक मज़बूत ढाल
जीवन की किताब के
कई पन्नों पर पड़ी है
दुखों और मुसीबतों की धूल
पर उनके बीच चमक रहा है
मेरा आत्मविश्वास
एक दिव्य शक्ति के समान
इसकी तेज़ रोशनी में
मैं नहा जाती हूँ
और वो रोशनी
चुपके से
मेरे कानों में कहती है
चल उठ.....
अभी तो शिखिर को
छूना है.....
यह भी तेरे जीवन का
एक पड़ाव है
अपने लक्ष्य प्राप्ति की
कल्पना से
मन विभोर हो उठता है
अपनी गरिमा को
महसूस करती हूँ मैं
और अपने ही
आत्मविश्वास के आगे
सर श्रद्धा से झुक जाता है
नमन करती हूँ मैं उसे
और पैर खुद्बाखुद
मंजिल की और
कूच करते हैं .......
सिम्मी मदन मैनी

ahaa ..amazing !!!
ReplyDeletethanks nisha
ReplyDelete