Friday, 30 May 2014

कहानीकार ( scriptwriter)

 

                 कहानीकार ( scriptwriter)

हम सभी
कहानियाँ  गढ़ने में माहिर हैं
सबके अंदर एक कहानीकार
छिपा  बैठा है
जो अंदाज़े लगाता  है
वो ऐसा होगा,,,,,
वो वैसा होगा ,,,,,,
ऐसा ही हुआ होगा ,,,,,
वो ऐसा सोचता होगा,,,,
जान बूझ कर ऐसा किया होगा ,,,,
सभी तो अपनी सोच के घोड़े
दौड़ते हैं ,,,
कल्पनाओं की कच्ची धरातल पर

और इसी बेबुनियाद फ़र्ज़ी ज़मीन पर
ज़िन्दगी के कड़े फैसले होते है जब
तो,,,,,,
सिवाय दुःख के
और कुछ नहीं देते
कहानियाँ जो बड़े परदे पर हिट होती हैं
वास्तविक जीवन में
पैरों तले  की ज़मीन खींच लेती हैं
और इंसान
टूटे रिश्तों की बंजर ज़मीन पर
अकेला हो जाता है

सिम्मी मैनी
30/05/2014

Tuesday, 27 May 2014

   

               मसाले  (spices)

वही  रसोई में
तेज़ी से काम करते हाथ
और मसालों की शेल्फ पर
कुछ मसाले ढूँढ़ते नज़रें
हर रोज़ वही बोर खाना
कहाँ रख दिए वह खास मसाले ???
जो कभी कभी काम आते हैं
अस्त व्यस्त इस शेल्फ में
भला अब कहाँ मिलेंगे


शेल्फ की सफाई करते
 सोच  रही हूँ
मंन की शेल्फ को भी कभी
साफ़ नही किया
उसमें भी  तो दुःख ,दर्द
नफरत,नाराज़गी और
ईर्ष्या के मसाले सबसे आगे हैं
शायद तभी ज़िंदगी नीरस है

कहीं पीछे धूल  में छिपे बैठे हैं
प्रेम,शांति ,पवित्रता और
ख़ुशी की मसाले
चलो कुछ पल एकांत में बैठ
मन की शेल्फ को साफ़ कर लूँ
और इन सभी खोए मसलों को ढूँढ कर
सुख के ऐसे व्यंजन बनाऊँ  कि
जीवन स्वादिष्ट हो  जाए

सिम्मी मैनी
28/05/2014


Sunday, 25 May 2014

 
हमेशा से सुनते आये कि अपने शब्दों का चुनाव समझदारी से करो क्योंकि यह शब्द ही है जो किसी को पल में अपना और पल में परया कर देते हैं ,,,यह शब्द ही है जो किसी  को  आकाश की ऊँचाइयों में तो किसी को पाताल की  गर्द  में पहुँचा  देते है ,,,,यह शब्द ही हैं जो किसी को कामयाब तो किसी को नाकामयाब बना देते हैं ,,,,हर  शब्द अपने आप में हमारी सोच  की ऊर्जा समेटे हुए है ,,,,

       बाँध ( DAM )

जब किसी की ज़ुबाँ  से
फिसलते हैं शब्द
तो क़यामत आती है
आत्म नियंत्रण की
कच्ची दहलीज़ को तोड़ते
जा गिरते हैं वक्त की
गहरी खाई में
और किसी अपने के मन को
घायल करते हैं
तीर की तरह भेद देते हैं
दिलों को ,,,
और लाख चाहने पर भी
कमान में वापिस नहीं आते
यूँ तो मन में बहुत से शब्द रहते हैं
और बड़ी रफ़्तार से दिन रात
नदी के तेज़ धारे  से बहते हैं
पर यदि ,,,
धीरज और समझदारी का बाँध पक्का हो
तो विकराल बाढ़  का रूप लेकर
रिश्तों की फसल को
बर्बाद नहीं करते

सिम्मी मैनी
26/05/2014

Saturday, 17 May 2014

रिश्ता दोस्ती का

   
    रिश्ता  दोस्ती का

सुना है ,,,
रिश्ते ऊपर से बन कर आते हैं
जो  जीवन का अटूट हिस्सा
हो  जाते हैं,,,
और खून के रिश्ते कहलाते हैं
पर एक रिश्ता
जो इनसे भी ऊपर है
जो मेरे ख्यालों में  रहता है
जिसे में खुद ढालती हूँ
और सजाती ,सँवारती  हूँ
बन जाता है ,,,,
रिश्ता दोस्ती का

जाने क्यों ?
तुम्हारी हर बात प्यारी लगती है
तुम में कभी कोई कमी नज़र नहीं आती
बिना रुके घंटों
तुमसे दिल की हर बात कर सकती हूँ
जानती हूँ कोई मुझे भी  सुनता है
 ठीक और गलत के तराज़ू में तोले  बिना
जाने कैसे तुम कैसे ?
मेरे दिल की हर बात
मेरी सांसों से पहचान  लेती हो

कभी मेरी छोटी सी गलती पर
गुरु की तरह करारी फटकार लगाती हो
तो कभी ,,,,
मेरी छोटी से उपलब्धी पर
माँ की तरह  पीठ थपथपाती हो
कैसे तुम मुझे मेरी ही नज़रों में
ऊँचा उठा देती हो

यह अटूट विशवास ही तो है तुम पर
कि  बिना सोचे और सवाल किये
तुम्हारे एक इशारे पर
 अंगारों पर भी चल सकती हूँ
ऐ दोस्त !
तुम्हे बस इतना कहना है कि
तुम मेरे कई जन्मों के
श्रेष्ठ कर्मों का फल हो ,,,,,

सिम्मी मैनी
17/05/2014





Friday, 16 May 2014

काहे चिंता करे तू प्राणी

      काहे चिंता करे तू प्राणी

काहे  चिंता करे तू प्राणी
अपने चिंतन में उसको बसा ले

बीती बातों की धूल उड़ा दे
कल क्या होगा ये कौन जाने
आज तेरा है
क्यों तू गवाएँ
अपने जीवन को जन्नत बना ले

क्यों घायल है यह मन बता दे
दर दर पे सुकून तलाशे
सच्चे मन से तू चल साथ उसके
भर अपना तू उसको थमा  दे

जो लुटा  है वो तेरा नहीं था
जो तेरा है मिलना है तुझको
बीज जैसा भी बोया था तूने
फल वैसा ही तू आज पा ले


काहे  चिंता करे तू प्राणी

सिम्मी मैनी
16/05/2014 ( एक पुराना  गीत जो मेरे दिल के बहुत करीब है )

Thursday, 15 May 2014

मेकअप

   
          मेकअप

कल रात पार्टी में मुलाकात हुई
चलते फिरते मोम के पुतलों से
मुस्कुराते चेहरे और उन पर
मेकअप की गहरी परते
त्वचा के हर श्वास छीनता 
और
चेहरे के दाग धब्बों को छिपाने की
नाकामयाब कोशिश करता पाउडर
पसीने से लड़ कर बाहर झांकती त्वचा
जो शायद आज़ादी की सांस लेना चाहती है

सोचती हूँ यह मेकअप शायद पल भर को
 चेहरे की कुरूपता को ढक भी ले
पर आत्मा पर जो
दान,ढोंग ,ध्यान ,राजनीति और धर्म का
मेकअप लगाया है
वो भला
 ईर्ष्या , नफरत ,दिखावे और द्धेष के धब्बों  को
कब तक और कैसे छिपा  पाएगा ?
कभी तो सच के पसीने से
दिल दहला देने वाली असलियत से
सामना हो ही जाएगा
इसलिए चेहरे और आत्मा पर
जितना मेकअप कम हो उतना ही  अच्छा
क्योंकि
कृत्रिम सुंदरता शरीर और आत्मा दोनों को
और अधिक कुरूप बना देती है शायद ,,,,

सिम्मी मैनी
16/05/2014

Monday, 12 May 2014

ऊर्जा (energy)



        ऊर्जा ( energy)

आज फिर एक नई सुबह
 चाय के प्याले के साथ
सोफे पर बैठी मैं
और
वही अनगिनत विचारों की
उठती तरंगें
लगता है जैसे
हर दीवार ,फर्नीचर , झूमर
और तस्वीर
मुझसे बात करने लगी है
कुछ प्रेम और सुकून कि तरंगें हैं
जो बह कर मुझ तक आ रही हैं
मैं हैरान सी
उन सब को देखती हूँ
ऐसा भी होता है कभी ?
भला ईंट , पत्थर , लकड़ी
और कांच भी  कभी बात करते हैं ?
तभी दीवार मुस्कुरा कर कह्ती  है
क्यों नहीं ?
जो विचारों की  ऊर्जा तुम हमें देती हो
वही लौट कर तुम तक वापिस जाती  है
तभी तो मन्दिर ,मस्जिद ,गुरूद्वारे में
तुम्हे सुकून मिलता है
हम भी भाव  और सोच पढ़ लेते हैं
अगर तुम्हारी सोच पवित्र है
तो तुम्हारा घर ही  मन्दिर है
मेरा  श्रद्धा से नतमस्तक  हो जाती हूँ
जैसे घर में उस  प्रभु से मिलन हो गया

सिम्मी मदन  मैनी 
13/05/2014



Sunday, 11 May 2014

दरिया

 

          दरिया

आज फिर एक  ख्याल ने
दिल पर दस्तक दी है कि
गर में इक दरिया हूँ
तो मेरा काम बहना है
बिना रुके ,बिना थमे
हर पल , हर क्षण
सिर्फ मंज़िल कि और बहना
इस बहते जीवन में
रिश्तों के  कई मुकाम आते हैँ
कुछ चट्टान बन राह रोकते है
और कुछ
लक्ष्य कि ओर  पहुँचाते हैं
कर्मानुसार इन रिश्तों से
मिलने और बिछड़ने का समय
पहले से निर्धारित है
उसमें कोई चूक नहीं
हर रिश्ता मुसाफिर  के सफ़र मेँ
आने वाला एक स्टेशन है
बस घडी भर रुकना है और
आगे  बढ़ जाना है
यह जान कर भी
इन रिश्तों में मोह
और दोषारोपण कैसा ?

सिम्मी मैनी
12/05/2014

Wednesday, 7 May 2014

माली

कई बार सोचती हूँ कि हम जीवन में आगे बढ़ जाते है , किसी बडे मुकाम पर भी पहुँच  जाते है और प्रशंसा और रुतबे को गले से लगा  लेते है पर उस मुकाम तक पहुंचने के लिये जिन सीढ़ियों का इस्तेमाल करते है क्या हम  उन्हे याद रखतें हैँ l हमारे जीवन में कई रिश्ते हमें प्रेम, सहायता और समझदारी  से सींचते है जैसे माँ बच्चे को निस्वार्थ प्रेम के झूले में झुलाती है ,गुरु शिष्य को आगे बढ़ाने में अपना सर्वस्व ज्ञान उस पर लुटा देता है और सच्चे दोस्त सदा  होंसला  बढाते  हैं और बिना कहे ही  दिल की छोटी से छोटी  बात समझ लेते हैं l मेरी यह रचना इन्ही महान रिश्तों को समर्पित --

                     माली

फूल की खुशबू
बिखर जाती है सदाओं में
और हर कोई उसे देख
मंत्रमुग्ध  हो जाता  है
प्रभु के चरणों में
चढ़ जाता है गर्व से
और
अपने अस्तित्व पर इतराता है
नाम और मान का चाँद भी  चमकता है
इस पुष्प के जीवन में
और उसकी चांदनी में
चुपके से अमर हो जाता है
पर जो सींचता है
अपने खून पसीने से
इस सुन्दर वृक्ष को
ताकि
यह सुमन जन्म ले सके
जाने वो माली
प्रशंसा की भीड़ में
कहाँ खो जाता  है ?

सिमी मदन  मैनी
08/05/2014






Monday, 5 May 2014

जवाबदारी


     
जवाबदारी

आप ही बतलाईये ज़रा
भला प्रेम और डर भी क़भी
एक मायन में रह सकते हैं ?
फिर क्यों कहते हैं हम कि
कुछ  भी करने से पहले
उस ऊपर वाले से डरो

कमाल है
उससे डरे ,,वो जो
पिता है
दया का सागर है
बिना किसी शर्त के
आपार प्रेम करता है हमसे
सच मानिए
यदि ऐसा है तो
पिता और सन्तान के सम्बन्ध पर
एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है

जहाँ डर है
वहां कैसे होगी
उससे दिल की  बात
और फिर रिश्ते में
दरार तो आ ही  जाएगी
इसलिए डरो मत
बस इतना सोचो कि
अपने हर कर्म की जवाबदारी
अपने उस पिता को देनी है
फिर देखना
हमारी यही सोच हमे सदा
सही रास्ता दिखलाएगी
और उसके साथ हमारा रिश्ता
अमर हो जाएगा

सिम्मी मदन  मैनी 
06/05/2014

Friday, 2 May 2014

ज़िंदगी एक पैकेज

         
       
ज़िंदगी एक पैकेज
   

ज़िन्दगी एक पैकेज है
अच्छे और बुरे का
इसमें खटास है उन परिस्थितियों की
जो मुझे पल में गिरा दें
और मिठास उन घटनाओं की
जो सातवें आसमान पर बिठा देँ
कुछ रिश्ते जो अंतर को
प्रेम से भर दें
और कुछ लोग जो
भीतर तक खोखला कर दें

बड़ा गहरा संतुलन है
सुख और दुख का
और यह तराज़ू परमात्मा के हाथ
जो मेरे कर्मों के बेहिसाब खातों को
शिद्दत से संभालता है
जब दुख से सामना होता  है
और साँस घुटने लगती है तो
सुख का मरहम लग कर
रिसते घाव भर देता  है


पिता है तो सब जानता है कि
बारी बारी से
मेरे कर्मों के खाते से
कब , क्या  और कितना देना  है
क्योंकि
इस शरीर में उसे मुझे तब तक
ज़िंदा रखना है
जब तक
मैं  इस जीवन का अन्तिम पाठ
ना  पढ़ लूँ

सिम्मी मदन  मैनी 
03/05/2014


ध्यान


 
     
ध्यान

हर दर पर जाकर
अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढे
और हर दर से ख़ाली लौटी हूँ
पल भर को शांती  से बैठ
अंतर में उठते इस शोर को
सुनने लगती हूँ
तो जान  जाती हूँ कि
विचारों की इस तेज़ आंधी मेँ ही
छिपा है सत्य कहीं

संकल्पों के इस बवंडर के
मध्य में जाकर टिक जाती हूँ
ध्यान में बैठ
विचारों का मंथन करती और
इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
पार निकल जाती हूँ
जहाँ असीम शांती है
प्रेम है
और मानस पटल पर
उन सभी सवालोँ के जवाब
साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
जिनकी मुझे कब से तलाश थी

सिम्मी मदन  मैनी  
02/05/2014

Thursday, 1 May 2014

मंजिल

 
   
मंजिल


भागती  दौड़ती  इस भीड़  में
जहाँ सब एक दूसरे  को  देख कर
कदम बढ़ाते हैं
पास हो कर भी
इकदूजे  से दूर होते हैं
वहां मैं कई बार
अकेली पड़ जाती हूँ

ख़ामोशी से सभी को
बहाव के साथ
बहते देखती हूँ
रस्ता आसान लगता हैं
पर चाह कर भी मैं
उस पर चल नहीं पाती
जाने क्यों हर बार
विपरीत दिशा में बहने का
चुनाव कर लेती हूँ मैं

अकेले बहना आसान नहीं होता
चुप्पी  डसने लगती  हैं
और मैं अंतर में उतर कर
अपनी कमी खोजने लगतीं हूँ
बार बार बात करती हूँ ख़ुद से
कहीं साथ चलने में मुझे
परहेज़ तो नहीं
और तभी भीतर से एक आवाज़ आती हैं


किन हँसते मुखौटों को  देख़ विचलित  हो
ग़ौर से देखो उन्हें
 उन सबने  किसी हौड़ मेँ
अपने अस्तित्व को  खो दिया
और रहा सवाल तुम्हारे रास्तें क़ा
कठिन रास्तों पर चलने वाले ही
ख़ूबसूरत मंज़िलों के मालिक होते हैं

सिम्मी मदन  मैनी