उद्देश्य
तो कोई हालत....
कोई विश्व ....
तो कोई समाज
कोई जीने का ढंग
तो कोई मिजाज़
अच्छी बात है
पर मैं ऐसा
नहीं कर पाती
क्योंकि ....
बाहर कि कितनी भी
सफाई करूँ
यदि भीतर कूड़ा है
तो बास आएगी
बस खुद को बदल सकूँ
यही जीवन का उद्देश्य है
देश, समाजऔर हालत
तो यक़ीनन
खुद ही बदल जायेंगे
कस्तूरी को भी
महकने के लिए
कभी मेहनत
करनी पड़ी है भला
सिम्मी मैनी
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