कैसे कहूँ ?
मन कि बात
डरती हूँ कि
आपकी नज़रों के
गहरे तीर
कैसे सह पाऊँगी?
नज़रें जो झाँकेंगी
अंतर में
और आंकेंगी
मेरा अस्तित्व
नज़रें जो पूछेंगी सवाल
और निकालेंगी
बाल कि ख़ाल
मैं जो सालों से
परदे में हूँ
खुद से नज़रें
कैसे मिलाऊँगी ?
मौन साधे बैठे हैं
इर्ष्या और द्वेष
मन में......
और नफरत का ज़हर
रगों में
दौड़ रहा है
अगर आप यह जान गए
तो खुद से शर्मिन्दा
हो जाऊँगी
कैसे बता पाऊँगी ?
अपनी सोच का छोटापन
बस झूठे और
बेबुनियाद उसूलों से
अपना चेहरा सजाउंगी
क्या अब भी आप
सुनना चाहेंगे मुझे ?
डरती हूँ कि
आपका सामना
कैसे कर पाऊँगी ?
सिम्मी मैनी

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