Tuesday, 20 March 2012

मायका .....

        मायका 

हाथ में बोरिया बिस्तर उठाये 
मैं  निकल पड़ी घर से अपने 
आत्मसम्मान की खातिर 
दिल टूट चुका था और
दिमाग ने काम करना 
बंद कर दिया था
काली गहरी रात में 
सोच  रही थी 
किस और जाऊं ?

तभी कई घरों के समूह में
एक अपना सा घर 
नज़र आया ...
और खिड़की से झांकते 
कई परिचित चेहरों ने
मुझे सहारा दिया
दरवाज़े पर
आरती की थाली लिए खड़ी
मेरी माँ थी ....
बुला रही थी उसकी 
प्यार भरी निगाहें 
मुझे अपनी ओर


पर यह क्या????
मेरा सामान देखते ही
माँ के मुख से
आरती की जगह 
गालियाँ बरसने लगीं 
सभी खिड़कियाँ 
बंद हो गयीं 
ओर बाबा के 
आशीर्वाद देने वाले हाथों ने
मुझे बहार का
रास्ता दिखाया 

मैं टूटी से
भारी क़दमों से
वापिस चल पड़ी
तभी पीछे से आवाज़ आई
कभी सोचा है ?
कि लोग क्या कहेंगे?

में सोच रही थी 
कि काश आप सुन पाते 
आपकी बेटी क्या कहना चाहती है?
ओर मेरा मायका 
पराया हो गया............

सिम्मी मदन  मैनी   

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