Saturday, 26 July 2014

" तुम्ही हो माता,  पिता  तुम्ही हो ,तुम्ही हो बंधु , सखा तुम्ही हो "  यह पंक्ति बचपन से सुनते आ रहे हैं ,,पर क्या इस बात  पर अटूट विश्वास भी है हमारा ? ,,,,वो हमारे मात पिता का भी मात पिता है ,,,,क्या हम उससे बिना सवाल किये उसकी दी हुई हर चीज़ को दिल से अपनाते हैं ,,,,बचपन की एक घटना मुझे याद है ,,,मुझे कुछ  skin  problem  हो गयी थी और मेरी माँ " साफी  " जो की एक कड़वी दवा है मुझे ज़बरदस्ती पिलाती थी ,,,,मैं पूरा घर आसमान पर उठा लेती ,,,पर माँ को जैसे कभी रहम नहीं आता ,,,,,,मैं घंटों उससे बात ना करती थी ,,,,,,,,माँ प्रेम करती थी सो जानती थी कि कब कितना मीठा देना है और कब कितना कड़वा ,,,,,,यदि माँ मोह वश बच्चे को दवा ना दे ,,,तो बिमारी अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाए ,,,,,माँ का निस्वार्थ प्रेम ही हमें हर दुःख से दूर रखता है ,,,हम ज़िन्दगी के सभी पाठ आसानी से पढ़ लेते हैं और एक कामयाब व्यक्ति बनते हैं ,,,,,,परमात्मा से बेहतर कोई नहीं जानता कि हमें कब ,क्या चाहिए ,,,,,,हम ही उस पर विशवास नहीं करते ,,,,जीवन के इस विशाल दरिया में वक्त आने पर वो हमें धक्का दे देता है ,,,,शायद वो जानता हैं की अब  हम   मुश्किलों की विशाल लहरों पर जीत पाने को तैयार हैं ,,,,वो एक कोच की भाँति हमें तैयार करता है ,,,,कसरत करना किसे अच्छा लगता है ? ,,,,पर यही कसरत हमारा स्टेमना बनाती है ,,,,जब हम परिस्थितियों के विशाल दरिया में होते हैं तो डर  जाते हैं ,,,,,पर भूल जाते हैं की किनारे पर वो खड़ा है और हमारे पार होने का इंतज़ार कर रहा है ,,,,,,इसी तरह एक एक करके जीवन का हर पाठ वो हमें पढता चला जाता है ,,,,इसलिए वो जब भी , जो भी , जितना भी दें ,,,,उसे सर माथे लगाएँ ,,,

Wednesday, 23 July 2014

एक बहुत जानी पहचानी कहावत है  " चिंता  चिता  समान ",,,,,सब जानते हैं ,,,सुनते हैं  पर चिंता की दलदल में फिर भी धँसे चले जाते हैं ,,,,,कल क्या होगा? ,,,कैसे होगा ?,,,,और भी ना जाने कितने सारे प्रशन दिमाग पर जैसे पहरा देते हैं ,,,,कठिन हालात में यह प्रश्नों का बवंडर दिलो दिमाग का सुकून हर लेता है और हम खुशी से कोसों दूर हो जाते हैं ,,,,,,,,भूत और भविष्य जैसे वर्तमान को निगल जाते हैं ,,,,सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति निर्धन हो जाता है क्योंकि वह प्रेम, शांति, शक्ति ,पवित्रता , ज्ञान और ख़ुशी किसी भी गुण का अनुभव नहीं कर पाता ,,,,,,,,,चिंता तन और मन दोनों को घायल कर देती है और इंसान अपनी सोचने , समझने ,निर्णय लेने और परखने की शक्तियाँ खो बैठता है ,,,,,,,,,,,,और इसके कारण उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है ,,,,,,,,चिंता एक ऐसा चश्मा है जो व्यक्ति को दृष्टिहीन बना देती है और जीवन में कोई   आशा की किरण दिखाई नहीं देती  ,,,,,,चिंता एक ऐसा विष है जो अंतर को खोखला कर देती है ,,,,,,,,,चिंता हमारे बहुमूल्य समय को निगल जाती है ,,,,जितना समय हम चिंता में बिताते हैं यदि प्रभु के चिंतन में बिताएँ  तो कठिन से कठिन समस्या का समाधान हो सकता है ,,,,परमात्मा का स्मरण हमें कष्ट से उभरने की शक्ति प्रदान करता है ,,,,,,और हम पहाड़ जैसी समस्या को एक छोटे स्पीड ब्रेकर की तरह पार कर लेते है ,,,,,,,,,,,,,,,,,


Thursday, 17 July 2014

हम अक्सर जीवन में एक शब्द का प्रयोग निरंतर करते हैं,,,,अटैचमेंट (attachment ),,,,,i am very attached to my husband, parents, son , daughter and even sometimes material things and ideas,,,,,यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि वो किसी से भी अटैच नहीं है तो उसे insensitive कहते हैं ,,,,पर क्या वास्तव में ऐसा है ,,,,अटैचमेंट यानी मोह ,,,,,,,प्रेम और मोह में एक पतली लकीर है जो की जीवन का रुख पूरी तरह से मोड़ देती है ,,,,जब हम किसी से अटैच होते है तो दुःख का जन्म होता है ,,,सामने वाला रोता है तो हम रोते  हैं ,,,हँसता है तो हँसते हैं ,,,,हमारी सोचने और समझने की शक्ति जैसे समाप्त हो जाती है ,,,किन्तु जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम संतुलित रहते हैं ,,,हमारी स्थिति सुख और दुख में एक समान रहती है ,,,,और हम सामने वाले को सही सलाह भी दे सकते हैं और संभाल  भी सकते हैं,,,,

मोह वश ही हम सभी कुकर्म करते हैं ,,,,गलत रास्ते  का चुनाव करते  हैं ,,,,किन्तु जीवन के अंतिम सत्य को भुला बैठते हैं ,,,, हम किसी वस्तु , रिश्ते  ,  रुतबे , धन  सम्पती , सोच से भले ही कितने  attach हों ,,,अंतिम यात्रा अकेले ही करनी है ,,,,और साथ कुछ नहीं जाने वाला,,,,यहाँ तक की अपना शरीर भी मिटटी में मिल जाना है ,,,,,यदि साथ कुछ जाना है तो वह केवल हमारे कर्म हैं ,,,,कर्म यानि जो बोला , जो किया और जो सोचा ,,,,हमारी सोच ही हमारा सबसे बड़ा कर्म है ,,,,हम पहले सोचते है ,फिर बोलते हैं और उसके बाद action होता है ,,,,,,इसलिए ज़रूरी है की हम अपने विचारों पर नज़र रखें क्योंकि  यही  एक ऐसा सामान है जो अंतिम  यात्रा 
में साथ जाएगा ,,,,,,,,,,,,,जाने क्या ले जाएँगे  हम इसी अटूट सत्य को सामने लाता है ,,,,,,,


सिमी मदन मैनी 

Monday, 14 July 2014

                                  शिकवे  से  शुक्राने  तक  का  सफर


पूजा अर्चना तो हम सभी करते हैं ,,,,वो पिता है तो दिल की हर बात भी उससे होती है,,,,मुझे याद है कि  अक्सर मैं उसे एक छोटा थैंक्स कह कर मन की बात को आगे बढाती थी ,,,,ऐसा क्यों होता है ? वैसा क्यों हुआ? उसने ऐसा क्यों किया? यह वक़्त पर क्यों नहीं हुआ ? ,,,,,और भी ना जाने क्या क्या ,,,,,मुझे कभी महसूस नहीं हुआ था कि यह बातें शिकायत हैं ,,,,मैं  तो इन्हें दिल की बात समझती थी ,,,,,,,,बस बात कहती चली जाती और लिस्ट बढ़ती चली जाती ,,,,जीवन प्रश्नों  से भर गया ,,,,,,,,और जवाब देने वाला कोई नहीं ,,,,,या फिर अप्रत्यक्ष रूप में सभी जवाब मिल रहे थे ,,,पर मेरी खुद की क्षमता उन्हें देखने , सुनने, और समझने की नहीं थी ,,,,,फिर जीवन में एक मोड़ आया ,,,,मैंने  सिस्टर शिवानी का कार्यक्रम आस्था चैनल पर देखा ,,,,और उस  बीस मिनट के कार्यक्रम ने जीवन , आत्मा और ईश्वर के प्रति मेरे दृष्टिकोण को बदल दिया ,,,,दिन के  तीन से चार घंटे यह कार्यक्रम देखना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया ,,,,,,,,अब तन की सफाई से पहले मन की सफाई नित नियम बन गया ,,,,मैंने महसूस किया की परमात्मा चाहे तो किसी यंत्र  को भी  जरिया बना कर आपकी मदद कर सकता है ,,,,,,,बस आपकी चाह सच्ची होनी चहिए ,,,,


परिस्थितियाँ  वहीँ थी पर देखने और समझने का नज़रिया  बदल चुका  था ,,,,,जान चुकी थी कि  बदलाव मुमकिन है ,,,,,,अब  कुछ भी अप्रिय घटता तो मुख से यही निकलता " परमात्मा तेरा शुक्र है " ,,,,,

when someone  criticizes me i overcome criticism
when someone insults me i overcome insult
when someone ignores me i overcome ignorance
when someone hurts me i overcome pain
when someone is jealous of me i overcome  jealousy  and feeling of competition
when i loose a  close relation or possession   i overcome attachments
when i or  my idea is being rejected i overcome rejection
when i am  not able to achieve,,,may be it is not the right time

ऐसे जाने कितने ही पाठ हैं जो वक़्त और परमात्मा ने पढ़ाए ,,,,,,शुक्राना सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि ऊर्जा है जो ब्रह्मांड में वेग से बहती है ,,,पिता से कहती है शुक्रिया तुमने जो भी दिया , जब भी दिया ,,,,तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता संतान को कब , क्या  और कितना देना है ,,,,,,,,,

इसी शुक्राने का जादू जीवन में फ़ैल गया  और " रब्बा तेरा शुक्राना "  भजन बन गया ,,,,,,,,,,,,,,




Sunday, 13 July 2014

                     
                                                               सपने

अक्सर आस पास सुनने को मिलता है ,,,अब हमारा क्या है ? ,,,,हमारा वक़्त बीत गया ,,,,अब तो बच्चे ही कुछ करेंगें ,,,,my son or daughter is living my dream ,,,,,पर क्या यह सच है ? क्या हमारी संतान हमारे सपनो को पूरा करेगी ? क्या यह सोचना जायज़ है ? मुझे लगता है जब हम अपने सपनो की ज़िम्मेदारी खुद नहीं ले पाते तो अपने सपनो का बोझ अपने बच्चों पर लाद देते हैं बिना यह विचार किये कि बच्चों की अपनी ख़्वाहिशें हैं अपने ख़्वाब हैं ,,,,या फिर हम अपने सपने को खुद ही नहीं पहचान पाते ,,,,,,,,,क्या हम जानते हैं हम किस काम की लिए बने हैं?  ,,,,किस काम में बेस्ट हैं  ? ,,,या फिर रोज़ी रोटी और लोकचारी  हमारे काम को तय  करती है ? ,,,क्या हम अपने सपने का सम्मान करते हैं ? अगर हाँ ,,,,तो दुनियाँ  की कोई ताकत उसे पूरा होने से नहीं रोक सकती ,,,,,अपने सपनो से कभी समझौता मत करो ,,,,यह सपने ही हैं जो कभी हकीकत बात जाते हैं ,,,,,,


एक दिन मैंने भी एक ख़्वाब देखा ,,,,,,रास्ता मुश्किल था ,,,,कोई short cut नहीं था ,,,पर मंज़िल तय थी ,,,,सपना शिक्षा का ,,,,शिक्षा सिर्फ किताबों को रट लेना नहीं है बल्कि जीवन में हर हालत में आगे बढ़ना है ,,,,आप जिस भी काम में अच्छे हैं उसमें महारत हासिल करना है ,,,,,,मुझे याद है मैंने जब संगीत सीखना शुरू किया तो घर में कई बार सब मज़ाक भी उड़ाते थे ,,,,पर मुझ पर वो शब्द कभी हावी नहीं हुए ,,,,सपने की शील्ड होती ही इतनी मज़बूत है ,,,,सपनो के  मैदान में में दौड़ तो नहीं पायी पर कदम कभी रुके नहीं ,,,,बस चलती रही ,,,,कई बार कई बार सब पूछते  " यह जो सब सीख रही हो बरसों से ,,करना क्या चाहती हो ? " अंतर से हर बार आवाज़ आती मैं  अपना सपना पूरा कर रही हूँ ,,,मैं  इसी के लिए बनी   हूँ ,,,,,RESPECT YOUR DREAMS,,,,,,DARE TO DREAM ,,,,,अपनी एक रचना आप सब के साथ बाँट रही हूँ ,,,,,

Thursday, 10 July 2014

सभी मित्रों को मेरा प्यार भरा  नमस्कार ,

कहते हैं खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं तो मैंने सोचा की क्यों ना मैं  भी आप के साथ अपने दिल की बात और एक छोटी सी सफलता बाँट लूँ ,,,, मैं  सिम्मी मैनी एक ग्रहिणी ,माँ , पत्नी ,बेटी ,बेहन , बहु और दोस्त हूँ ,,,,,जाने कितने ही रिश्ते है जो शब्दों  में बाँधे नहीं जा सकते ,,,,,इन्ही रिश्तों को निभाते हुए अपनी आम सी ज़िन्दगी में मैंने एक खास सपना देखा जो अपनों की दुआओं और परमात्मा की असीम कृपा से पूरा हुआ ,,,,मेरी एक ऑडियो cd  जिसमें की नौ भजन हैं वीनस कंपनी द्वारा रिलीज़ की गयी है ,,,यह भजन मैंने ही लिखे हैं ,,,इनकी धुन भी मैंने ही बनायीं है ,,,और परमात्मा की दया से यह गीत गए भी मैंने ही हैं ,,,,संगीत जसपाल मोनी जी ने दिया है और वीडियो यशुदास जी ने बनाया है ,,,,,इस एल्बम का नाम है  "जाने क्या ले जाएँगे  हम "  the ultimate truth of life 

इस एल्बम के सभी गीत अपने आप में जीवन दर्शन को समेटे हुए हैं ,,,,,यह दरअसल मेरे अनुभव हैं जो ईश्वर  के दिशा निर्देश  से भजन बन गए  ,,,यह भजन आप वीनस के offical site पर देख सकते हैं ,,,,इसके लिए आपको you tube पर simmi maini टाइप करना होगा ,,,,चाहें तो jane kya le jayenge hum भी टाइप कर सकते हैं ,,,,मुझे उम्मीद है की मेरी यह छोटी सी कोशिश आपके पसंद आएगी और शायद आपके जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव ला सकेगी ,,,,,,,कृपा इस एल्बम को अपनी दुआएँ  और आशीर्वाद दें 

धन्यवाद 
सिम्मी मैनी 

Wednesday, 9 July 2014

                           
                                                 संगीत और लेखन की शुरुवात

इस जीवन यात्रा में हम सभी कोई ना कोई लक्ष्य अपने सामने लेकर चलते हैं ,,,, यही छोटे छोटे लक्ष्य जब पूरे होते  हैं तो हमारी यात्रा हमें आसान लगने लगती है ,,,, यह सपने ही हमें हमारी सम्पूर्णता , ताकत और गुणों  का  अहसास दिलाते हैं ,,,,इस जीवन में सुख , दुःख के कई स्टेशन आते हैं और हर स्टेशन पर  हम कोई एक पाठ  पढ़  लेते हैं ,,,,,मेरी जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही है ,,,,मैं  सिम्मी मैनी एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी ,,,खेलते कूदते , पढ़ते लिखते जीवन तेज़ गति से भाग रहा था ,,,,छोटी छोटी आँखोँ में बड़े बड़े सपने थे ,,,किताबों से मुझे विशेष लगाव था ,,,,मैं  london  school of economics में पढ़ना चाहती थी ,,,,संगीत  बचपन से सदा दिल पर दस्तक देता  रहा पर  संगीत की कोई formal tranning नहीं थी ,,,,एक भावुक व्यक्ति होने के कारण विचारों का मंथन सदा मन में चलता रहा और बहुत बार कागज़ पर भी फ़ैल गया ,,,,मेरा संगीत और लेखन से सिर्फ इतना ही नाता था ,,,


बहुत बार हम जो सोचते हैं वैसा हो यह ज़रूरी तो नहीं ,,,,मेरी किस्मत और कर्म मुझे किसी और ही दिशा में लेजा रहे थे ,,,,कई नए रिश्ते मेरा इंतज़ार कर रहे थे और मात्र बीस वर्ष की आयु में मेरा विवाह हो गया ,,,,एक संयुक्त परिवार में अपने शिक्षा के सपने को अंजाम देना आसान नहीं था ,,,,साधन थे पर पढ़ने का वक्त नहीं था ,,,,वक्त बीतता चला गया और बीतते वक़्त के साथ में पत्नी से माँ बनी ,,,जिम्मेदारियां हर दिन वक़्त के साथ बढ़ रही थीं ,,,,किसी चीज़ की कमी नहीं थी पर अधूरी शिक्षा का सपना हर रोज़ भीतर से आवाज़ लगा रहा था ,,,विवाह को दस वर्ष बीत चुके थे ,,,एक दिन मेरे बच्चों के संगीत शिक्षक से बात करते हुए मैंने उन्हें बताया कि  मैं भी संगीत सीखना चाहती थी ,,,,बस वहीँ से मेरी संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई ,,,शिक्षा और संगीत की तरफ रुझान इस यात्रा को रोमांचक बना रहा था ,,,रायज़ का बहुत वक़्त तो नहीं मिलता था पर चलते फिरते , खाना बनाते , उठते बैठते कुछ ना कुछ गुनगुनाती रहती थी ,,,आज सोलह वर्ष हो गए संगीत से जुड़े और वक़्त का पता ही नहीं चला ,,,,


                                                        लिखने  की प्रेरणा

हर व्यक्ति की जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जब वो स्वयं को भीड़ में अकेला पाता  है ,,,और वो समय खुद से बात करने का होता है ,,,भीतर झाँकने का होता है ,,,और यही  सब करते हुए हम उस परमपिता परमात्मा से कैसे जुड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ,,,,,मेरा ऐसा मानना है की जीवन के सबसे कठिन दौर और परिस्थितियों में हम सबसे अधिक सफलता पा सकते हैं ,,,,इस समय में या तो हम बन जाते हैं और या फिर हम बिगड़ जाते हैं ,,,,यह इस बात पर निर्भर करता है की हम किस दिशा का चुनाव करते हैं ,,,,,,मेरे जीवन में भी एक ऐसा वक़्त आया जब स्वयं को परखने का मौका मिला ,,,,हर चीज़ जैसे हाथों से फिसल रही थी ,,,,,,कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करना चाहिए ,,,,निर्णय लेना कठिन था ,,,,कड़वे सच का एक एक पन्ना  धीरे धीरे नज़रों के सामने खुल रहा था ,,,,और इसी समय में जैसे हर पल उससे बात होने लगी ,,,लगता की जैसे वो अदृश्य होकर  भी सामने है और मार्गदर्शन कर रहा है ,,,,जैसे भीतर बैठ कर वो हर बात का जवाब दे रहा था ,,,,,यही बातचीत कब भजन बन कर कलम के ज़रिये कागज़ पर उतर गए ,,,,मैं खुद नहीं जानती ,,,दरअसल यही बातचीत आप इस एल्बम में सुन पाएंगे  जिसका नाम है  "जाने क्या ले जाएँगे हम ",,,,सो ईश्वर ने स्वयं जैसे मेरा हाथ थाम  लिया  और लिखने को प्रेरित करते रहे ,,,,,,,,,,,



                                                 एल्बम बनाने का ख्याल कैसे आया ?

बहुत  अरसे  से गुनगुना भी रही थी और लिख भी रही थी ,,,संगीत और लेखन मेरे जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके थे पर cd  बनाने का ख्याल कभी मन में नहीं आया था ,,,कुछ रोज़ इस तबियत बिगड़ रही थी ,,,मैं एक दिन डॉक्टर के पास गयी और उन्हें बताने लगी की मेरा वज़न १० किलो बढ़ गया है ,,,शायद बढ़ती  उम्र के साथ कोई harmonal disbalance है ,,,अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी की डॉक्टर साहिब ने पूछा  "आप क्या करती हैं ?",,,,,मैंने जवाब में उन्हें बताया कि  मैं एक house wife हूँ ,,,,डॉक्टर साहिब मुझे इस तरह देखने लगे जैसे मैंने कोई पाप कर दिया हो और छूटते ही  बोले " बस करना क्या है सारा दिन ,आराम करो ,खाना खाओ और बेकार के टीवी  सीरियल  देखो ,,,,,वज़न तो बढ़ना ही है ",,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब ने जैसे किसी घाव को कुरेद दिया था ,,,,मैंने उनकी फीस दी और क्लीनिक  से बाहर निकल आई ,,,,मन में हलचल थी ,,,और अतीत की फिल्म मन की परदे पर चल रही थी ,,,,मैं सोचने लगी की क्या मैं घर पर इसलिए हूँ की काबिल नहीं हूँ ? या फिर इसलिए की दूसरों को काबिल बनाने की क्षमता है मुझमें ? लोग इतनी आसानी से कुछ भी कह देते हैं ,,,,,एक औरत अपने सपने , सोच सब कुछ पीछे छोड़ देती है क्योंकि वो दूसरे  के सपनो को अपने पसीने और मेहनत  से  सींचती है ,,,,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब से यह मुलाकात मन में चुपचाप बैठे सपने को आवाज़ लगा गयी ,,,,और मैंने महसूस किया की आती जाती हर सांस के साथ शायद मैं उस सपने को जी रही थी ,,,,और एल्बम बनाने की सोच ने जड़ें पकड़ ली ,,,,क्योंकि आपसे दिल की  बात बाँट रही हूँ तो अपनी एक प्रिय  रचना आपके साथ   शेयर कर रही हूँ -


                                             आम ग्रहिणी

आएँ  मुझसे मिलें
मैं हूँ एक आम ग्रहिणी
रसोई में काम करती
पसीने में तरबतर
राजमां और पालक पनीर की सुगंध
मुझे कई बार स्वपनलोक में ले गई
मैंने कई बार बेलन को माईक
और थाली को ढफ़ली बनाया
जब बच्चों को सच बोलना सिखाया
तो देश के आने वाले सुन्दर भविष्य की
कल्पना की मैंने
घर में झाड़ू लगाते हुए '
कई बार पाया
जैसे मैं  समाज की बुराइयों को
दूर हटा रही हूँ
निचुड़ते कपड़ो से निकली
पानी की धार
और झाड़पोंछ  से उड़ती मिट्टी  में
मैंने जो सपने संजोये
आज उन्हें  हकीकत में बदल डाला
क्योंकि आज होंसला है मुझमें
सपने देखने का
आगे बढ़ने का
और कुछ कर दिखाने का
आएँ मुझसे मिलें
मैं हूँ
एक आम ग्रहिणी

सिम्मी मैनी







Sunday, 6 July 2014

नमस्कार

आज आप सभी के साथ अपनी एक छोटी सी  उपलब्धी  बाँटना  चाहती हूँ ,,,,बरसों की मेहनत  के बाद मेरी  एक  cd   वीनस कंपनी ने रिलीज़  की है ,,,,इसमें नौ  आध्यात्मिक गीत है ,,,,यह भजन मैंने ही लिखे हैं ,धुन भी मेरी है और गाए भी मैंने ही हैं ,,,,,यह सभी गीत आप you tube पर भी देख सकते हैं ,,,,इसके लिए आपको you tube  पर simmi maini टाइप करना होगा ,,,,इस एल्बम का नाम है  " जाने क्या ले जायेंगे हम ",,,,,,इसी एलबम का एक गीत  आपके साथ बाँट रही हूँ ,,,,शायद आपको पसंद आये ,,,,,,


                             जाने क्या ले जायेंगे हम


जाने क्या ले जाएंगे हम
जब इस दुनियां  से जायेंगे
बंद मुठ्ठियाँ खुल जाएँगी
कोई बोल बोल ना पाएँगे
जाने क्या ,,,,,,जाने क्या


ढूंढेगे  हम तब कुछ ऐसा
जो अपने संग जाए
महँगे कपडे या गहने ले लें
जो थे मन को भाए 
ना संग चलेंगे महल चौबारे
ना ही भाई बहनें
जाने क्या ,,,,,जाने क्या


जिस तन का श्रृंगार किया था
जिस घर को कभी संभाला था
जिस धन को कभी समेटा था मैंने
जिन रिश्तों में रस डाला था
देखो सब कुछ छोड़ चले हम
कोई काम ना आया
जाने क्या ,,,,,जाने क्या


सत्संग किया होता हमनें
तुमनें तो बहुत समझाया था
तेरा नाम लिया होता हमनें
यह जग तो बहुत पराया  था
अब संग चलेंगे कर्म हमारे
अपना साथ निभाने

बस यही ले जायेंगें हम
जब इस दुनियां से जायेंगें
बस यही ले जाएंगें हम
बस कर्म ले जायेंगे हम

 सिम्मी मैनी