Thursday, 5 July 2018

अलग किरदार पर एक तासीर





अलग किरदार पर एक तासीर 

तुम्ही कहो ना कैसा होता बचपन 
अगर इसमें नानी और दादी की 
कहानी ना होती 
क्या यूंही मज़े से बीतती ज़िन्दगी 
अगर माँ की गोद में चढ़ कर 
हर अच्छी और बुरी बात 
जानी ना होती 


सच कहती हूँ 
बढ़ने में  भला क्या लुत्फ़ आता 
अगर  बहनों की कुछ बातें नकारी 
और कुछ मानी ना होती 
बूढ़ी सी हो जाती ज़िंदगानी 
अगर इसमें सखियों ने 
राज़ की कुछ बातें 
जानी ना होतीं

कैसा होता ससुराल में वो पहला दिन
अगर सास ने माँ बनकर
कलाई थामी ना होती
 कैसे ढाल पाती खुद को  नए घर में
अगर ससुराल में बहनों सी
ननद ,देवरानी और जेठानी ना होती


घर में घर वाली बात ना होती शायद
अगर इसमें बेटी की
कुछ शैतानी ना होती
कौन संभालता वंश की परंपरा को
अगर बहू घर की लक्ष्मी और रानी ना होती
रिश्तों की दास्तान  अधूरी  सी होती शायद
अगर परिवार में
ताई ,चाची ,बुआ ,मौसी ,मामी ना होती


श्रद्धा से सिर  झुक जाता है उसके सजदे में
जिसने औरत को बनाया
और दी इतने सारे किरदारों को
निभाने की अपार  क्षमता


किरदार भले ही कोई हो हमारा
पर हमारी तासीर तो एक ही है
फिर क्यों रिश्तों में बाँटें
इस मानवता के बंधन को
क्या एक औरत को समझने के लिए
एक औरत ही होना काफी नहीं


चलो थाम लें दामन
और एक ऐसी दुनिया बनायें 
जिसमें एक दूसरे को
नीचे खींचने  की जगह
थोड़ा ऊपर उठाएं
और हर बढ़ते कदम के साथ
जो चौखट के उस पार अकेली है
उसे अपना बनाएं









  





Wednesday, 4 July 2018

तुम्हे बेचती हूँ

तुम्हे बेचती हूँ
तुमसे मिलने लोग 
जाने कहाँ कहॉ जाते है
तुम्हें मंदिर में सजाते हैं
छप्पन भोग खिलाते हैं
माँगते है दुआएँ 
और
दान दक्षिणा चढ़ाते हैं
पर मैं तुम्हें टोकरी में भर कर
रोज़ बाज़ार में बेचती हूँ
मोल भाव करते है तुम्हारा
तुम्हें मंदिर में बिठाने वाले
माफ़ करना कई बार तुम्हारा दाम
पचास पैसे और गिरा देती हूँ
 तुम तो जानते ही हो
कि हर रोज़
 तुम्हें बाज़ार में बेच कर
मेरा पेट पलता 
 

उस पार

 उस पार · 
जानती हूँ मैं कि
समय की बाड के उस पार
तुम रहते हो

तभी तो तुम्हारे इन्तज़ार में
अपना सभी सामान समेटे
मैं बैठी हू इस पार

कौन जाने तुम कब आकर
हाथ थाम लो

इन गठरियों में मेरी कमाई है
कुछ करम और संस्कार
जो साथ जाने हैं

पीछे छूट जाएँगे
खट्टी मीठी यादों के
कुछ चहचहाते पंछी

और मै टूटकर
कल फिर जीवन वृक्ष पर उभरूँगी
नव पल्लव की तरह

कोख

कोख


कितनी तरह के विचार बहते हैं
तुम्हारी कोख में

कहीं उजले विचारों की गंगा 
मुझे महकाती है
तो कहीं शक्ति से भरे विचारों का
लाल सरोवर
मेरे मन की प्यास बुझाता है

पर यहीं कहीं बहता है
काले भय से भरे विचारों का नाला
जो मुझे डराता है
और कमज़ोर बनाता है

मै तो अभी बारिश की पहली बूँद सा
अनछुआ और पावन हूँ
जिस रंग में मिल गया
वैसा ही हो जाऊँगा

माँ बस तुम इस काले पानी का रूख
परमात्मा की ओर मोड़ दो
मेरा घर भर जाए
प्रेम और शक्ति के सागर से
और मै उसमें तैर कर
तुम्हारी गोद में समा जाऊँ

धूप और छांव


धूप और छांव 

धूप और छांव का खेल तो 
जीवन में चलता ही रहता है 
साया भी कभी साथ होता है 
तो कभी साथ छोड़ देता है 
पर हिम्मत और 
कुछ कर गुज़रने की तमन्ना
मंज़िल के क़रीब खींचती है
और क़दम रोके नहीं रुकते 

चाहत

चाहत 

गर दामन में 
सितारों की चाहत हो तो 
नज़रें आकाश से मिलानी होंगी 
क़तरा क़तरा होकर 
पिघलेंगे सितारे भी 
चाहत की गरमी से
और तुम्हारा अस्तित्व
अपनी चमक से
रोशन कर देंगे

बेड़ियाँ या फिर पंख

बेड़ियाँ या फिर पंख

आप अपनी बेटी को 
पाँव में अलता लगा कर 
झाँझर पहनाएँ
और पिया के घर भेजें

या फिर स्कूल के जूते पहनाकर
सुखद भविष्य की और क़दम बढ़ाने दें
पसंद आप ही की है
और फ़ैसला भी आप का

पर किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले
अपने दिल से पूछ लें कि
आप आपके कलेजे के टुकड़े को
तोहफ़े में क्या पसंद आएगा ?
बेड़ियाँ ... जो उसके अस्तित्व को
पनपने से रोक दें
या फिर
पंख... जो उसकी उड़ान को
एक मुक़ाम तक ले जाएँ