Wednesday, 29 February 2012

बंजर ज़मीन ..........

वो  हैरानी से
मुझे देखते हुए बोले
अरे! ये कैसे हुआ?
मैंने मुस्कुरा कर कहा
इसमें कौन सी बड़ी बात है
ईमानदारी का बीज था
सो बंजर ज़मीन को भी
हरा कर गया.....

सिम्मी मैनी 

Monday, 27 February 2012

पिंजरा .........

     पिंजरा 

हम पिंजरे के पंछी
अपने कर्मों के आधार पर
अपना पिंजरा पाते हैं
सलाखें सोने की हों 
या फिर पीतल की
जो पिंजरे में बंद हों
कैदी ही कहलाते हैं

इस शरीर मैं बंद 
हम
झटपाटते हैं
फडफडाते  हैं
पिंजरे में बंद पंछी 
सिर्फ रोते हैं
वो  बेचारे कहाँ
गा पाते हैं
यह क्षणभंगुर शरीर ही
अपना घर है
बस इसी भ्रम में
जीते जाते हैं

एक शाश्वत सत्य
कि....
पिंजरे कि चाबी उसके हाथ
और पिंजरे पर समय का ताला 
समय आने पर खुलेगा ताला
और हम उड़ जायेंगे
अपने वतन
और फिर एक और नया पिंजरा
हमारे इंतजार में  
जानते तो सब हैं हम
पर ना जाने क्यों?
इस पिंजरे के मोह में 
फँसते जाते हैं
फँसते जाते हैं

सिम्मी मैनी            

Sunday, 26 February 2012

मैं क्यों आई ?.....

मैं क्यों आई ?


सदियाँ बीतीं 
खुद से बात किये
संकल्पों के शोर में
मेरी आवाज़
दब सी जाती है

कहने को तो
आँखें सोती हैं 
हर रोज़ घंटों 
पर आत्मा की पलकें 
अब भी भारी हैं

काश!
सो जाएँ सब विचार
पल भर को
और शायद
खुद से बात हो जाये

मुमकिन है मिल जाएँ 
उन सब प्रशनो के उत्तर 
जो मन के भीतर कब से 
कुलबुलाते हैं
और शायद में ये भी 
जान जाऊं ........
कि
मैं इस दुनिया में क्यों आई ?
मैं इस दुनिया में क्यों आई ?

सिम्मी मैनी         

Friday, 24 February 2012

मेरी उपज ........

मेरी उपज ........

बिना मेरी इजाज़त के भला
कोई क्या देगा मुझे?
सामने वाला तो बस अपनी
दो बात कहता है
और अपने रास्ते चलता है
दर्द तो मेरी ही उपज है
जो मन में
धीरे धीरे पलता है

चुभन का बीज
बोती हूँ मन में
और माफ़ करने का 
ढोंग भी करती हूँ
फिर अदृश्य आंसुओं से
सींचती हूँ 
उस बीज को
और अब 
नफरत की आग पर 
अपमान की हांड़ी में 
दर्द धीरे धीरे उबलता है

धधकता है 
दर्द का ज्वालामुखी 
दिल में
पर में फिर भी
मुस्कुराती हूँ
जब तक क्रोध का लावा
फैलता नहीं
आपको इस सच का
पता कहाँ चलता है
दर्द तो मेरी ही उपज है
जो मन  में धीरे धीरे पलता है

शायद कमज़ोर हूँ मैं 
और नासमझ भी
वरना 
चुभन की जगह 
माफ़ी का बीज बोती
आंसू छोड़ 
करती उस बीज पर
प्रेम फुहार 
तो आज सच में
मुस्कुरा पाती
खिलखिला पाती
और दर्द की जगह
प्रेम गीत गा पाती

सिम्मी मैनी 

Thursday, 23 February 2012

जो समय दिखाए .........

     जो समय दिखाए

तू जो समय दिखाए- सर माथे
चाहे सुख हो दुःख हो- सर माथे
फूल हो ,शूल हो
प्रेम, घ्रिनाह
सब कर्मो का लेखा-सर माथे


रंगमंच के पात्र
सभी  हम
तू  सब खेल
रचाए  है
डोरी खिंचते ही
नाच उठे हम
तुझ बिन सभी
पराये हैं
तू दया दिखा दे-सर माथे
चाहे सज़ा सुना दे-सर माथे
सुन ले अब तो
ओ सुखदाता
तू जो भी चाहे-सर माथे

पतितो को तू
पवन कर दे
निर्मल को
दे दे काया
तूने जिसकी
बांह पकड़ ली
वो तो भव से
तर आया
तू पार लगा दे-सर माथे
मेरी भूल बता दे-सर माथे
सद्गुणों के भंडार
हो दाता
तेरे नाम का अमृत -सर माथे

तू जो समय दिखाए-सर माथे
चाहे सुख हो दुःख हो-सर माथे

सिम्मी मैनी        

Wednesday, 15 February 2012

कैसे गिरने दूंगा ?...........

कैसे गिरने दूंगा?

तुम भी ना
कुछ नहीं समझते
बस यूँ ही निकल पड़ते हो
और कागज़ पर बिछ जाते हो
इतना भी नहीं देखते
तुम मेरा मान संभाले हो
अपने हाथों में
गर टकरा  गये किसी से
और धूल में गिर पड़ा वो 
तो मेरा क्या होगा?
कभी सोचा है?

देखो मैं तुम्हारा अनुभव हूँ
तुम्हारा अंश हूँ
इसलिए
ना तो झूठा हूँ
और ना ही कायर

मैं विचलित होकर बोल उठी
थोड़ी चालाकी से तो चुन सकते हो
शब्दों को
और कुछ बातें बना कर भी तो
कह सकते हो
तुम देखते ही नहीं की 
सब क्या सोचेंगे ?

पर मैं तुमसे अलग कहाँ हूँ
तुम्हारी परछाई हूँ
जब भी उतरूंगा लेखन के मैदान में
पूरी शान से उतरूंगा
ईमानदारी से नज़र मिलकर दौडूंगा 
और गैरों के दिलों में भी घर कर जाऊँगा 

भरोसा रखो खुद पर
तुम्हारा अनुभव हूँ मैं
भला तुम्हे कैसे गिरने दूंगा?
तुम्हे कैसे गिरने दूंगा?

सिम्मी मैनी 

Tuesday, 14 February 2012

भीड़ .......

 भीड़ ......
                                                                                                     
मैं भी कही खडी  हूँ
इस  भीड़ में
सोचती हूँ ? मैं कहीं
इसका  हिस्सा ना बन जाऊं , ,
कितना मुश्किल है अलग करना
खुद  को इस भीड़ से ,,
कि सब मुझ पर
हावी  होना चाहते हैं 
कहीं ऐसा ना हो मैं  उलझ जाऊं
खोखले  रिवाजों और बातो में
और अपनी पहचान खो दूं 
मैं भी कहीं लाखो करोड़ो लोगो में गुम  
गुमनाम किस्सा ना बन जाऊं  

सिम्मी मैनी