कैसा शोर?
उफ़ !!!!!!!!
कैसा शोर विचारों का यह?
जो नींदें भी चुराता है
सब कुछ होते हुए भी
इंसान याचक बन जाता है
रात ना बीते
कितने ही जतन कर
और....
मखमल का बिछौना भी
शूल शैया हो जाता है
झगड़ते हैं सभी विचार मन में
भूत और भविष्य के
और इस कोलाहल में
बेचारा वर्तमान
बहुत ही डर जाता है
काश मिल जाए
सुकून कि कपास कहीं
तो शायद
आत्मा के कानों को
कुछ आराम मिल जाए
ज़रा सुस्ता लें सभी संकल्प
पल भर को...
और मुमकिन है कि
वर्तमान को जीने की
राह मिल जाए
सिम्मी मैनी
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