त्याग
कभी सपने का
कभी अपने का
कभी सोच का
कभी स्वाभिमान का
कभी पसंद का
कभी धन का
कभी शौक का
कभी शरीर का
कभी रोटी का
कभी रिश्ते का
कभी लफ्ज़ों का
कभी भावनाओं का
कभी घूमने का
कभी विद्या का
कभी उम्मीदों का
कभी बचपन का
कई बार सोचती हूँ
मैंने कई बार
इन सबको छोड़ा
बिना कुछ बोले
कभी प्रेम के चलते
कभी फ़र्ज़ समझकर
कभी ईश्वर के डर से
सुना था की त्याग
महान होता है
पर जिसे मैं त्याग
समझ बैठी
वो सच में त्याग था?
या फिर कोई मजबूरी
चैन से जीने की?
या फिर
आपका कहना ही ठीक है?
कि वो मेरा फ़र्ज़ था
अगर वो फ़र्ज़ भी था
तो उस फ़र्ज़ कि उम्मीद
सबने मुझसे कि
पर उसे निभाने में
कोई खरा नहीं उतरा
सिम्मी मदन मैनी

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