Thursday, 29 December 2011

जीत का परचम...............

          जीत का परचम...............

चल उठ फिर से
कि दौड़ में फिसलने वाले
हारा नहीं करते
तू ही है- जो इस तूफ़ान का सामना कर सके
तू ही है- जो समेट सके टूटे सपनो के टुकड़ों को
तू ही  है- जो अँधेरे में दीप जला सके
तू ही है- जो धारा के विपरीत दिशा में बह सके
तू ही है- जो झेल सके कुदरत के शूल
तू ही है- सह जाये दूसरों की नज़रों के गहरे तीर
             और फिर भी स्थिर रहे
तू ही है- जो संभाल सके जीवन का भार
तू ही है- जो बनी है कईयों के जीवन का आधार
तू ही है- जो लड़ सकती है हर कठिनाई से
तू ही है- जो न सुख में उछ्लेगी और न दुःख में डोलेगी
तू ही है- लक्ष्मी, सरस्वती , और दुर्गा
ज़रा झांक खुद में
और अपनी ताकत को पहचान
डर मत, अभी यह तेज़ हवाओं का शोर है
जो थम जाएगा ,तेरे उठते ही
चल उठ... खड़ी  हो जा
कि कमज़ोर हैं
वक़्त कि यह हवाएं तेरे सामने
देखना तुझ से टकराकर लौट जाएँगी
और छोड़ जाएँगी एक असीम शांति
जो एहसास कराएगी तुझे
कि तुझसा हिम्मतवाला
दूसरा  और कोई नहीं
और देखना तू ही लहराएगी
जीत का परचम...............


सिम्मी मदन मैनी




Friday, 23 December 2011

कोई नहीं जानता.........

             कोई नहीं जानता

हम ही सोचते हैं कि
हमें कोई नहीं जानता
पर यकीन मानिये
खुली किताब है हम

हर बात लफ़्ज़ों में बयां हो
ये ज़रूरी तो नहीं
कि चेहरे पर जो आँखें हैं
वो भी बतियाने का
काम करती हैं

जुबां कुछ कहती है
दिमाग कुछ सोचता है
पर ये जो दिल है कमबख्त
कुछ कहने से पहले
सोचता ही नहीं
मजबूर कर देता है
भावों को
और
आंसू भी हैं
इसके आधीन

पलट देता है
जीवन के सभी पन्ने
और आसानी से
सब पढ़ लेते हैं उन्हें
और हम इसी
भ्रम में जीते हैं कि 
हमारी असलियत
कोई  नहीं जानता

सिम्मी मैनी






खुद की दोस्त .....

            खुद की दोस्त 

मैं खुद की दोस्त हूँ
सबसे पक्की ,सबसे सच्ची
मैं खुद ही गिरी
और खुद ही
उठ खड़ी हुई


खुद ही बिखरी
और खुद ही जुड़ गई
सिर्फ एक मैं हूँ
जिसने खुद को कभी
हैरत भरी नज़रों से नहीं देखा
चोट लगी कभी
तो खुद ही संभल गयी
खुद को पुचकारा
और खुद ही अपने
घाव पर मरहम लगाया
खुद ही ढूंढी राह
और उस पर बढ चली




खुद ही अपनी गलतियों
से सीख ली और
खुद ही अपनी उपलब्धिओं पर
अपनी पीठ थपथपाई
खुद ही गिरते पड़ते जीवन के
कई पाठ सीख गयी




कभी कुछ नहीं
छिपाया खुद से
और सदा समय पड़ने पर
अपना साथ दिया
कभी कोई प्रशनचिंह
नहीं लगाया अपने अस्तित्व पर
और सदा खुद को मान दिया




खुद से सदा प्रेरणा ली
एक बेहतर इन्सान बनने की
खुद की कमियों को स्वीकार
और खुद की खूबियों को
निखारा खुद ही


घंटो बात की खुद से
समय पड़ने पर
और खुद ही ढूँढ निकाले
उन सब प्रश्नों के उत्तर
जिनके लिए लोग अक्सर
दूसरों का सहारा
ढूँढा करते हैं
क्योंकि
मैं खुद की दोस्त हूँ
सबसे पक्की ,सबसे सच्ची


सिम्मी मदन  मैनी







Monday, 19 December 2011

ईर्ष्या ...........

             ईर्ष्या

आज भागदौड़ के ज़माने में
हर दूसरे व्यक्ति का
 रक्तचाप बढ रहा है
क्योंकि दौड़ रही है ईर्ष्या
खून के साथ रगों में
पूरे वेग से
मार रही है ईर्ष्या
प्रेम और अपनेपन को
और अब तो खून भी
पानी बनने लगा है


सबसे बेहतर होने की चाह
और धन और नाम की भूख
आत्मा को निरंतर
 खोखला  कर रही है
ईर्ष्या रुपी नागिन
बिना फुम्फ्कारे
डस रही है शांति को
और एक ऐसी खाई का
निर्माण कर रही है
जिसे भरना नामुमकिन हो
अपने हो रहे हैं दूर
और पाप के शस्त्र संभाले हम
जुटे हैं जीतने की होड़ में
ईर्ष्या भी उम्र के साथ
बड़ी हो रही है


काश हम ईर्ष्या को
नया रूप दें
और ऊपर चढ़ने वालों की सीढ़ी
 खींचने की जगह
हम अपने लिए
 एक ऐसी सीढ़ी बनायें
जो हमें भी किसी
मुकाम पर ले जाये

सिम्मी मैनी





सादगी.......

चरित्र.....

Friday, 16 December 2011

ख़ुशी ....

             ख़ुशी

आओ मिलो मुझसे
मैं ही हूँ ख़ुशी
लाखों करोडो निगाहें
भटकती हैं
मेरी तलाश में
मानो मैं कोई
धुंदला तारा हूँ
बादलों से भरे
आकाश में

मैं कोई चीज़ नहीं
एक एहसास हूँ
दूर मत जाओ खुद से
मैं तुम्हारे पास हूँ
जानते हो
मेरे ही कारण तुम
करते हो कठिन परिश्रम
चाहते हो मान सम्मान
ढूँढ़ते हो ऊंचा ओहदा
बटोरते हो धन की खान




कई रास्ते अपनाते हो
मुझे पाने को
तुम सोचते  हो
धन के साथ आऊंगी मैं
या फिर शोहरत के पास मंडराऊँगी
नाम और शान में ढूँढ पाओगे तुम मुझे
या तुम्हे सम्मान मिलते ही
तुममे समां जाऊँगी


मैं एकटक चुप्पी साधे
रंगमंच पर होते
इस नाटक को देख रही हूँ
देख रही हूँ हर पात्र को
पूरी लगन से
अपना पाट निभाते

मेरे न मिलने पर
तुम दूसरों को
दोषी ठहराते हो
लक्ष्य साधा है मुझपर
पर गलत दिशा में जाते हो
कायर हो तुम
तभी तो मुझ से
बेगाने हो
अभी तुम जीवन के
रहस्य से अनजाने हो
तुम वो मृग हो
जो कस्तूरी की इच्छा में
बेइंतिहा  भागता है
और अचेत हो जाता है
तब संसार का कोई सुख उसे
ख़ुशी न दे पाता है


लगता है तुम डरते हो
खुद के भीतर जाने से
तभी तो शिकायत है
तुम्हे पूरे ज़माने से
तुम तो स्वयं
कस्तूरी की खान हो
यदि खुद को जान लो
तो "ख़ुशी" तुम्हारा नाम हो
आँखें बंद करो
और महसूस करो मुझे
तुम हैरान हो जाओगे
बस आत्मा में भर लोगे मुझे
और खुद पर इतराओगे
और जान जाओगे कि मैं
लेने का नहीं
देने का नाम हूँ

सिम्मी मैनी

सच और झूठ ...........

          सच और झूठ

सच का छोटा दिया
 टिमटिमा रहा है
और काट रहा है अँधेरा
तभी आया झूठ रुपी तूफ़ान
और सभी आ गये
 उसकी चपेट में


तेज़ हवा के झोंके
बुझाना चाहते हैं
सच का दिया
पर लौ पूरी तेज़ी से
लड़ रही है
तेज़ तूफ़ान से

झूठ  के निकल आये हैं
लाखों करोडो हाथ
अब सच को खुद पर
यकीन नहीं रही
फडफडा रहा है
आज भी
अपना अस्तित्व
बचाने को

लचकीला झूठ
 बदल रहा है रूप
अपनी सफाई में
और सच रुपी
कड़क पुतला
जूझ रहा है
तूफ़ान से
कि तेज़ हवा का एक
झोंका ही काफी है
उसे मिटाने को


सच पड़ा है बेबस
किसी कोने में
और अपमानित
हो रहा है
लोग उड़ा रहें  हैं खिल्ली
चढ़ रहा है झूठ
सीढियाँ कामयाबी की
और सच थामे खड़ा है
वो सीढ़ी
ताकि कोई गिर न जाये


पर कोई नहीं गिरता
रौंदते हुए सच के हाथ
सभी चढ़ते हैं
कामयाबी की सीढियाँ
कुचले जाते हैं
सच के हाथ
और अपमानित सच
आदर्शों और किताबी बातों की
मरहम घाव पर लगाता है


पर क्या कभी भरेंगे यह घाव?
झगड़ रहें है सच और झूठ
आत्मा में डेरा डाले


मानती हूँ झूठ के
काले बादल छायें हैं
पर देखो बादल के किनारे पर
अब भी सच की सुनहरी लकीर
चमक रही है


सिम्मी मैनी













Friday, 9 December 2011

सुकून........

        सुकून

कहाँ हो तुम?
कब से तलाशती हूँ तुम्हे
कभी ढूँढती हूँ तुम्हे
लम्बी गाड़ी में
तो कभी
महंगी साडी में
खोजती हूँ तुम्हे
हीरे मोती की
 चमक में
तो कभी
 सिक्कों की खनक में
कभी संग में
तो कभी
सत्संग में


पर तुम नहीं मिलते
तुम्हारी तलाश
तुमसे दूरी का एहसास
और बड़ा  देती है
हर रास्ता, हर विधि
हर दर, हर कोशिश
बेकार हो जाती है
तो थक कर
बैठ जाती हूँ

एकाएक ख्याल आता है
पूरा घर,नगर
देश, विश्व ,ब्रह्माण्ड
छान डाला
 तुम्हारी तलाश में
पर खुद को
खोजना बाकी है

अपने अन्दर झांकती हूँ
तो तुम बैठे हो मेरे अन्दर
कहीं शांत भाव से
ऐ सुकून
तुम्हे पाने में मैंने
यूं ही व्यर्थ
गवां दी ज़िन्दगी


सिम्मी मैनी











Tuesday, 6 December 2011

पिघलती आइसक्रीम ........

                  पिघलती आइसक्रीम


रेड लाइट पर रुकी है गाडी
और बच्चे कर रहे हैं हल्ला गुल्ला
बच्चों की ख़ुशी देख झूम रहा है मन
तभी मैंने देखी दूर दो नन्ही आँखें
जो टकटकी लगाए देख रही हैं
बच्चों की आइसक्रीम

ठहर गयी वह दो आँखें
मानों इशारा कर रही हों
अपने पैरों को
गाड़ी के पास आने का
तभी उम्मीद भरे दो हाथ
बढ़ते हैं गाड़ी की खिड़की में
नज़रें,हाथ और भाव
सभी चाहते हैं
पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे




बस और नहीं खाना
चिल्लाता है ईशान
और फ़ेंक देता है आइसक्रीम
गाड़ी से बाहर
चमक उठती हैं
वो दो बेबस आँखें
मिट्टी में पड़ा कोन देख कर
हाथों पैरों में जान आ जाती है
नन्हे हाथ बड़ी सफुर्ती से झाड देते हैं मिट्टी
और पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे
तृप्त कर देती हैं उस पिघलते मन को

पहली बार स्वादिष्ट आइसक्रीम
 खाने का एहसास
साफ़ छलक रहा है चेहरे से
वो दो आँखें फिर ढूँढने लगती हैं
 किसी पिघलती आइसक्रीम को
मैं अपनी आइसक्रीम
उन हाथों में थमा देती हूँ
आज उसे आइसक्रीम खाते देख
वो सुकून मिलता है
जो बरसों मंदिर ,गुरूद्वारे,गिरिजाघरों में ढूँढा
आँख से आंसू बहने लगते हैं

तभी एक आवाज़ आती है
आंटी और आइसक्रीम है क्या?
हरी बत्ती हो जाती है
गाड़ी पकड़ लेती है रफ़्तार
पर वो दो नन्ही आँखें
आज भी पीछा कर रही हैं मेरा
और मांग रही हैं
पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे


सिम्मी मैनी






Saturday, 3 December 2011

साथ छोड़ जाते हो .....

            साथ छोड़ जाते हो

तुम सदा साथ चलते हो

हँसती हूँ तो हँसते हो

रोती  हूँ तो रोते  हो

मेरी हर एक अदा

भाती है तुम्हे


तभी तो  हर वक़्त

पीछा  करते हो

डरते हो मैं कहीं

खो ना  जाऊँ

इतना प्रेम करते  हो मुझसे


पर ऐ  मेरे  साये

अँधेरा  होने पर

तुम भी क्यूँ


साथ छोड़  जाते हो..........


सिम्मी मैनी





बस इतना चाहती हूँ .....

                बस इतना चाहती हूँ


बाँट सकूँ  तो बाँटू  खुशियाँ

जुटा   सकूँ तो  जुटाऊं  लोग

कमा सकूँ तो कमाऊँ प्रेम

माँग सकूँ तो माँगूं  दुआ


दे सकूँ तो दूँ अपनापन


छोड़ सकूँ तो छोडूँ  ईर्ष्या

घटा सकूँ तो घटाऊँ द्वेष

समां   सकूँ तो  समां लूँ  नफरत


पी सकूँ तो पी लूँ क्रोध


हँस सकूँ तो हँस लूँ  खुद  पर


सीख सकूँ  तो सीखूँ  जीना


और क्या कहूँ  मैं तुमसे प्रभु


मैं तो बस इतना चाहती हूँ


सिम्मी मैनी






Friday, 2 December 2011

हाथ किसने छोड़ा था?

 हाथ किसने छोड़ा था?


यह जो हलके से
मेरी ऊँगली थामे है,
यह कौन है?
तुम हो या मेरा साया
जिसके स्पर्श मात्र
के एहसास से
चन्दन सी महक
उठती है काया
सोचती हूँ
यह कौन है?
तुम हो या मेरा साया


मेरी उंगली थामे तुम
मेरी परछाई बन जाते हो
काँटों भरी राह देख
अभिभावक की तरह
हर कठिनाई पार कराते हो
वाकिफ हो जीवन के हर सच से
तभी तो मंजिल तक पहुचाने का
पूरा भार उठाते हो


मैं ही भटक जाती हूँ राह
और तुम्हारा हाथ छोड़
भागती हूँ एक अनजानी दौड़ में
जब थक जाती हूँ तो
निगाहें ढूँढती हैं तुम्हे




अरे !तुम तो पास ही खड़े हो
अब तुम अपना हाथ
मेरी और बढ़ाते हो
मैं थाम लेती हूँ हाथ तुम्हारा
और डर से मुक्त हो जाते हूँ
एक अजीब सुकून मिलता है मुझे
टकटकी लगाये देखती हूँ तुम्हे
कभी शिकायत करती हूँ
तो कभी नाराज़ होती हूँ
पर तुम विचलित नहीं होते

मंद मंद मुस्कुराते हो
और हलके से कहते हो
हाथ किसने छोड़ा था?
जब तुम्हारी आस्था
डगमगाती है मुझ पर
तो तुम ही छोड़ देती हो मेरा साथ
भरोसा रखो मुझ पर
और देखो-
मैं हूँ सदा तुम्हारे साथ

सिम्मी मैनी