Monday, 30 July 2018

स्कूल के वो दिन


स्कूल के वो दिन

क्या तुम्हें याद है
मॉर्निंग असेम्ब्ली से बंक मारना
और उस समय में 
अपना होम्वर्क पूरा करना
यूँ ही कभी सुबह सुबह ड्यूटी ले लेना
ताकि लम्बी असेम्ब्ली से जान बच जाए
ज़ीरो पिरीयड के ख़त्म होने पर अफ़सोस करना
और टीचर के ना आने की दुआएँ माँगना
हौले हौले बातें करना
और बार बार घड़ी देख कर
पिरीयड के ख़त्म होने का इंतज़ार करना
लंच का रीसेस से पहले ही ख़त्म हो जाना
और गरमी में पानी की लम्बी क़तार में लगना
कभी कभी टीचर के ना पढ़ाने पर
ज़ोरदार जशन मनाना
साल शुरू होने पर
कापी किताबों को ब्राउन पेपर से कवर करना
और ख़ूब मेहनत करने की नाकाम क़सम खाना
पेपर पास आने पर तेज़ ताप चढ़ जाना
और पढ़ाई बनाने वाले को गालियाँ निकालना
अपने जन्म दिन पर फ़्रेंड्ज़ को ट्रीट देना
और अपने पैदा होने पर इतराना
छुट्टी के बाद भाग कर बस में सीट मलकना
और घर आने पर ख़ुशी से झूम जाना
जब बच्चें थे तो बड़े होने का
इंतज़ार करते रहे
आज बड़े होकर जाना
कि बीते स्कूल के दिन ही
ज़िंदगी के बेहतरीन दिन थे
तुम ही कहो
सच है ना

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....







  
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....

यादों जे पिटारे को ज्यूँ ही खोला
कई मासूम और प्यारी समृतियाँ
मचल कर झोली में आ गिरी 
मैं उन्हें झटपट बटोरने लगी
कि कहीं कोई मेरे दामन से छूट ना जाए
यहीं तो मेरे जीवन के सबसे क़ीमती पल हैं
जिन्हें वक़्त की माला में पिरो के रखा है
तुम्हारा बचपन वो ख़ज़ाना है
जो हर पल मुझे अमीर कर जाता है
तुम दोनो का मुझसे घंटो बतियाना
और सवालों की झड़ी लगा देना
मुझे कैसे ऊर्जा से भर देता था
दिन भर की थकान
बस एक तुम्हारी मुस्कुराहट से
कम हो जाती थी
स्कूल का पूरे दिन का ब्योरा
बस एक ही साँस में
दे देते थे तुम दोनो
घंटों कहानियाँ सुनते थे मुझसे
और जब चिपक कर सोते थे मुझसे
तो मेरा चेहरा किस की तरफ़ होगा
इस बात पर बहस छिड़ जाती थी
अंशुम बहुत रोए थे तुम
जब तुम्हें कोट पैंट पहनाकर
पीछे पूँछ लगा कर स्कूल भेजा था
मैं भी क्या करती
जनवरी की कड़क सर्दी में भी भला कोई
बच्चे को हनुमान बनने को कहता है
ईशान जब एक दिन
मैं थक कर सो रही थी
और तुम्हारी मीठी आवाज़
जब मुझे नींद से ना जगा सकी
तो तुम कैसे घबरा कर बोले थे
लगता है मम्मी मर गई 😊
मैं तो सुन कर जी उठी थी उस पल
आज तुम दोनो बड़े हो गए
अब कोई झगड़ा नहीं इस बात पर
कि मेरे साथ कौन सोएगा
तुम्हारी लम्बी कहानियाँ
हाँ , हूँ में बदल गईं
पर सच कहूँ तो वो दिन बहुत अच्छे थे
काश कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

अर्ध शतक

               अर्ध शतक 

इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास है 
ज़िंदगी का अर्ध शतक पूरा किया हैं मैंने 
पर इस बार ज़िंदगी को  देना होगा 
हर बीते पल का हिसाब 
कैसे कटे यह पचास साल 
कहीं बीते लमहों से कोई 
बेइंसाफ़ी तो नहीं की मैंने 

ज़िंदगी एक 
खुली किताब की तरह 
आँखों के सामने है 
हर सफ़े पर गढ़ें हैं 
कुछ रोते हँसते 
और 
मीठे कड़वे सच 

पलट कर देखती हूँ 
अपनी ग़लतियों को 
और ग्लानि से मुक्त होकर 
इन ग़लतियों को 
अनुभवों का नाम देती हूँ

अपनी छोटी छोटी उपलब्धियों पर
गर्व महसूस करती हूँ 
और कोशिश करती हूँ 
उस दूरी को नापने की 
जो आज तक मैंने तय की 

बहुत कुछ पाया और गँवाया 
बहुत कुछ सीखा और सिखाया 
बहुत कुछ नकारा और अपनाया 
और यूँही जीवन के कई वर्ष 
हाथ से रेत की तरह फिसल गए 

पलों को बाँध पाना उतना ही कठिन है 
जैसे रेत को मुट्ठी में समेटना 
बस इतना चाहती थी कि 
हर  बीतता लम्हा
पवित्र ओस की बूँद की तरह 
जीवन कमल के पत्ते पर चमचमाए 
नाकि दुखों के कीचड़ से मिल कर 
अपनी ख़ूबसूरती और अस्तित्व खो दे 
और ऐसा ही हुआ 

ज़िंदगी की लहरें 
जाने कितने ज्वार भाटे झेल गईं 
और मिट कर बार बार फिर बनी 
लहरों का सफ़र अब भी जारी है 
और अंतिम क्षणों तक चलता रहेगा 
हर बार किनारा दूर होगा 
और हर बार मैं उछल कर 
उस किनारे को छू लूँगी 
क्यूँकि हर लहर चाहे 
जितने हिचकोले खाए 
किनारा तो पा ही लेती है 
और एक दिन पहुँच जाती है 


अपने मुक़ाम तक 

Thursday, 5 July 2018

अलग किरदार पर एक तासीर





अलग किरदार पर एक तासीर 

तुम्ही कहो ना कैसा होता बचपन 
अगर इसमें नानी और दादी की 
कहानी ना होती 
क्या यूंही मज़े से बीतती ज़िन्दगी 
अगर माँ की गोद में चढ़ कर 
हर अच्छी और बुरी बात 
जानी ना होती 


सच कहती हूँ 
बढ़ने में  भला क्या लुत्फ़ आता 
अगर  बहनों की कुछ बातें नकारी 
और कुछ मानी ना होती 
बूढ़ी सी हो जाती ज़िंदगानी 
अगर इसमें सखियों ने 
राज़ की कुछ बातें 
जानी ना होतीं

कैसा होता ससुराल में वो पहला दिन
अगर सास ने माँ बनकर
कलाई थामी ना होती
 कैसे ढाल पाती खुद को  नए घर में
अगर ससुराल में बहनों सी
ननद ,देवरानी और जेठानी ना होती


घर में घर वाली बात ना होती शायद
अगर इसमें बेटी की
कुछ शैतानी ना होती
कौन संभालता वंश की परंपरा को
अगर बहू घर की लक्ष्मी और रानी ना होती
रिश्तों की दास्तान  अधूरी  सी होती शायद
अगर परिवार में
ताई ,चाची ,बुआ ,मौसी ,मामी ना होती


श्रद्धा से सिर  झुक जाता है उसके सजदे में
जिसने औरत को बनाया
और दी इतने सारे किरदारों को
निभाने की अपार  क्षमता


किरदार भले ही कोई हो हमारा
पर हमारी तासीर तो एक ही है
फिर क्यों रिश्तों में बाँटें
इस मानवता के बंधन को
क्या एक औरत को समझने के लिए
एक औरत ही होना काफी नहीं


चलो थाम लें दामन
और एक ऐसी दुनिया बनायें 
जिसमें एक दूसरे को
नीचे खींचने  की जगह
थोड़ा ऊपर उठाएं
और हर बढ़ते कदम के साथ
जो चौखट के उस पार अकेली है
उसे अपना बनाएं









  





Wednesday, 4 July 2018

तुम्हे बेचती हूँ

तुम्हे बेचती हूँ
तुमसे मिलने लोग 
जाने कहाँ कहॉ जाते है
तुम्हें मंदिर में सजाते हैं
छप्पन भोग खिलाते हैं
माँगते है दुआएँ 
और
दान दक्षिणा चढ़ाते हैं
पर मैं तुम्हें टोकरी में भर कर
रोज़ बाज़ार में बेचती हूँ
मोल भाव करते है तुम्हारा
तुम्हें मंदिर में बिठाने वाले
माफ़ करना कई बार तुम्हारा दाम
पचास पैसे और गिरा देती हूँ
 तुम तो जानते ही हो
कि हर रोज़
 तुम्हें बाज़ार में बेच कर
मेरा पेट पलता 
 

उस पार

 उस पार · 
जानती हूँ मैं कि
समय की बाड के उस पार
तुम रहते हो

तभी तो तुम्हारे इन्तज़ार में
अपना सभी सामान समेटे
मैं बैठी हू इस पार

कौन जाने तुम कब आकर
हाथ थाम लो

इन गठरियों में मेरी कमाई है
कुछ करम और संस्कार
जो साथ जाने हैं

पीछे छूट जाएँगे
खट्टी मीठी यादों के
कुछ चहचहाते पंछी

और मै टूटकर
कल फिर जीवन वृक्ष पर उभरूँगी
नव पल्लव की तरह

कोख

कोख


कितनी तरह के विचार बहते हैं
तुम्हारी कोख में

कहीं उजले विचारों की गंगा 
मुझे महकाती है
तो कहीं शक्ति से भरे विचारों का
लाल सरोवर
मेरे मन की प्यास बुझाता है

पर यहीं कहीं बहता है
काले भय से भरे विचारों का नाला
जो मुझे डराता है
और कमज़ोर बनाता है

मै तो अभी बारिश की पहली बूँद सा
अनछुआ और पावन हूँ
जिस रंग में मिल गया
वैसा ही हो जाऊँगा

माँ बस तुम इस काले पानी का रूख
परमात्मा की ओर मोड़ दो
मेरा घर भर जाए
प्रेम और शक्ति के सागर से
और मै उसमें तैर कर
तुम्हारी गोद में समा जाऊँ