Saturday, 6 August 2016

तेज़ाब

                         तेज़ाब

 माँ !
 तुम और मैं इतने अलग क्यों दिखते हैं ?
नन्ही पीहू बोल पड़ी
क्या में भी बड़ी होकर तुमसी दिखने लगूँगी ?

लक्ष्मी ने झट से मासूम पीहू को
बाँहों के घेरे में समेट लिया

और मुस्कुराते हुए बोली
नहीं बेटा ,,,
मेरी पीहू तो परी सी दिखेगी

गले लगी पीहू ने
माँ के माथे को चूमा
और परीलोक में खो गई


लक्ष्मी अब भी तेज़ाब की जलन
सीने में महसूस कर रही थी

धधकते दिल ने अंदर से आवाज़ दी

देखना लक्ष्मी
अब किसी नारी के लिए
 मर्द को ना कहना
इतना दर्दनाक ना हो

अब कोई लक्ष्मी
यह घाव  ना  झेले

और ना ही कोई पीहू
अपनी माँ से यह सवाल पूछे

अब कभी ऐसा नहीं होगा
लक्ष्मी दृढ़ता से बोली

क्योंकि अब बाज़ार में
 तेज़ाब की बिक्री पर रोक है

रोक है  मर्द को ज़बरदस्ती
हाँ कहलवाने पर

रोक है किसी जानवर के
सरेआम घूमने पर

और यह लड़ाई मुझ अकेली की नहीं
लाखों बहने हैं मेरे साथ
हम देखेंगे कि
 भविष्य में हर एक पीहू
अपनी हाँ और ना की
मालिक खुद हो

सिम्मी मदन मैनी



Thursday, 4 August 2016

वरदान

          वरदान

रूप निखरने लगा है मेरा
चेहरे की महीन लकीरों
और झुर्रियों के झुरमुट में

हर लकीर में कैद हैं
कुछ खट्टे  मीठे अनुभव
कुछ राज़
और कुछ सुनहरी यादें


 काले बालों से झाँकती है
हलकी सफेदी
जैसे काली गहरी रात में
बिखर जाती है चांदनी
और रोशन कर देती है
हर ज़र्रे को

ढलता शरीर  थिरकने लगता है
बीते वक़्त की ताल पर
और कयानात पीठ थपथपाती है मेरी
ठंडी हवा होले से
कान में फुसफुसाती है
"मुझे नाज़ है तुम पर ,,,
इसे कहते हैं ज़िंदादिली से जीना "


और
 मुझे एकाएक अहसास होता है कि
 उम्र का यह पड़ाव
 किसी वरदान से कम  नहीं
यह तो एक खज़ाना है
अनुभवों  का
जो मैं अभी अपनों में बाँट रही हूँ
और इसे  में यहीं एक दिन
 मेरे अपनों के लिए छोड़ जाऊँगी

सिम्मी  मदन मैनी









मंगल भारी है

      मंगल  भारी  है

होगा गठबंधन कुत्ते संग
अभी प्रथा ये जारी है
नारी अपमान सहती जाएगी
क्योंकि मंगल भारी है

बढ़ते अंधविश्वास
और दबी हँसी में
इक बेटी फिर हारी है
आत्मसम्मान फिर छलनी होगा
क्योंकि मंगल भारी है

कुत्ता पहला पति बनेगा
हुआ फरमान यह जारी है
वह ही पहले मांग भरेगा
 क्योंकि मंगल भारी  है

स्वयं बेटी का करें अमंगल
खुद उसका सम्मान हरें
शिक्षित होकर डर से हारें
बेटी कुत्ते  को दान करें

बेटी के मन की व्यथा तो सोचो
वो अपनों से हारी है
क्या कसूर बेटी का इसमें ?
हुआ जो मंगल भारी है

सिम्मी  मदन  मैनी  

पराया घर

         पराया घर

यह सिन्दूर बड़ा भारी है
देखो ना फैलने लगा है
सुनहरे भविष्य के चाँद पर
एक ग्रहण की तरह
और
 बचपन भी  मरने लगा है
जिम्मेदारी के सख्त दुप्पट्टे से

बंद हो रही हैं आँखें
और कोमल सपने पनपने से पहले ही
सलाखों में कैद हो रहे हैं

बुझने लगा है मुस्कान का दिया
बंधने के डर  से
और सांसें घुटने लगी हैं

कैसे झेल पाएंगे ?
मेरे मासून कंधे इस बोझ को
अभी तो में खुद ही
 संभलना नहीं सीख पाई

बाबा ,,,,,,
क्या मैं कुछ दिन और यहाँ रह सकती हूँ ?
जहाँ मैं जन्मी
या फिर
बेटी पैदा ही पराये घर में होती है ?

सिम्मी  मदन मैनी









Wednesday, 26 August 2015

ज़िन्दगी

                 
           ज़िन्दगी


ज़िंदगी कट  तो जाएगी
बस यूँही चलते चलते
पर बात तो तब है
जब इसे ज़िंदादिली से
 जिया जाए
आज जब इबादत के लिए हाथ उठे
तो मैंने खुदा  से कहा कि
मुझ नाचीज़  पर बस
 इतना करम करना
कि हर दम तोड़ते पल में मुझे
ज़िन्दगी  नज़र आए

सिमी मदन मैनी 

Thursday, 6 August 2015

कारीग़र

                   कारीग़र


चोट तो हर बार सहते हैं हम
और दर्द भी निखरता है
पर तुम भी…
बड़े कारीगर हो मेरे खुदा
मुझे तराशने को
कर्मों की छैनी और
वक़्त का हथौड़ा
तब तक चलाते हो मुझ पर
जब तक मुझे संवार कर
पत्थर से हीरा ना कर दो......

सिमी मदन मैनी
07-08-2015

Saturday, 7 March 2015








                                                                अहंकार



  काम, क्रोध , मोह , लोभ और अहंकार  सभी बड़े परिचित शब्द हैं ,,,,,,कहते है काम ,क्रोध , लोभ ,और मोह पर विजय प्राप्त करना सरल तो नहीं परन्तु नामुमकिन भी नहीं ,,,,अभ्यास और वैराग्य द्वारा इन पर विजय प्राप्त की जा सकती है ,,,,,परन्तु अहंकार एक ऐसा दोष है जो हर व्यक्ति के मन में कहीं किसी कोने में घर कर के बैठा है ,,,,अहंकार इतना सूक्षम है कि मनुष्य को उसके होने का आभास तक नहीं होता ,,,,,,शक्तिशाली होने का , बुद्धिमान होने का , धनी होने का , रिश्तों का , सुंदरता का , किसी गुण विशेष का , भक्त  होने का , स्वभाव से विनम्र होने का , संस्कारी होने का यह सभी अहंकार है ,,,,विनम्रता का अहंकार भी मनुष्य को पतन की और ले जाता है ,,,, जीवन में  घटने वाली सभी घटनाएं एक ऐसा आईना हैं जिसमें हम अपने अहंकार के दर्शन कर सकते हैं ,,,,,,,,दिन में ना जाने  कितनी  बार हम मैं  शब्द का प्रयोग करते हैं ,,,,,,कोई भी रिश्ता , ओहदा , गुण ,रूप , ज्ञान सदा साथ रहने वाला नहीं है ,,,,जिस क्षण हममें इनमें से किसी भी बात का अहंकार उत्पन्न होता है ,हम पतन की और अग्रसर होते हैं ,,, बरसों पुराने रिश्ते पल में कांच की तरह बिखर जाते हैं , राजा रंक हो जाता है ,शक्ति क्षीण हो जाती है , रूप और गुण धूल में मिल जाते हैं और ज्ञान धरा का धरा रह जाता है ,,,,,,जिस प्रकार माँ अपनी संतान का मल मूत्र साफ़ करती है उसी प्रकार परमात्मा भी हमारे जीवन में अलग अलग परिस्थितियों से हमारा सामना कराते हैं जिससे हमारे मन में बैठा अहंकार लुप्त हो सके ,,,,,परमात्मा पहले सब कुछ देता है और फिर एक पिता की भांति अपनी संतान को परखता है कि उसकी दी हुई नियामत का हम कैसा प्रयोग करते हैं ,,,,हर चीज़ जो दिखाई और सुनाई देती है वह पूरा सच नहीं है ,,,,,सच उससे पार है ,,,,,और अहंकार  का पर्दा हटने पर ही उसे देखा और महसूस किया जा सकता है ,,,,,,यदि वह देखता है कि उसके दिए ख़ज़ाने का  अहंकारवश हमने सही प्रयोग नहीं किया तो दाता किसी भी समय अपनी दात हमसे वापिस ले सकता है ,,,,,,,,वह कब शक्तिशाली को  निर्बल , ज्ञानी को  अज्ञानी   और , धनी को निर्धन  बना दे कौन जाने ?,,,,,,,हर पल अपने अहंकार से बात करना ज़रूरी है ताकि इतना भान तो रहे कि वह सिर्फ दूसरों में ही नहीं बल्कि मेरे भीतर भी रहता है ,,,,वह बात अलग है की हम देख सिर्फ दूसरों में पाते हैं ,,,,,,

सिमी मदन मैनी