Tuesday, 11 November 2014

वक़्त

 
        वक़्त

किस धुन में भाग रहे हो ?
इतनी तेज़ रफ़्तार से

तुम्हारा हर कदम
एहसास दिलाता है कि
तुम कितने बलवान हो

सभी वायदों , कसमों
रिश्तों और सोच से बड़ा है
तुम्हारा अस्तित्व

पल भर  में
आसमान  की
बुलंदियों पर पहुँचा देते हो

और पल में
स्वर्ग को शमशान बना देते हो

तुम चाहो तो
ताश के पत्तों की तरह
ढेह जाता है अभिमान पल में

तुम मेहरबान होते हो तो
कबीर जैसा फ़क़ीर भी
दिलों की बादशाहियत पता है

और ,,,,,
रावण जैसा बलवान भी
खाक में मिल जाता है

क्षण भर में दिलों की दरार को
खाई बना  देते हो
और चाहो तो
नफरत की बंजर ज़मीन पर
प्यार के फूल खिला देते हो

कौन सिखाता है तुम्हे यह सब ?
और,,,,
कहाँ से आती है इतनी शक्ति तुममें ?

मुझे तो  लगता है कि
तुम परमात्मा के
सबसे करीब हो

तभी तो कर्मानुसार
किसके साथ कब , क्या , क्यों करना है ?
इस बात की पूरी
खबर है तुम्हे ,,,

सिमी  मदन  मैनी







Monday, 10 November 2014

नमस्कार ,,,,

मूसा वी ,ईसा वी , नानक वी , राम वी
जिदी गोदी विच खेड़े नवी ते इमाम वी

ऐसी का एक नारी की महिमा कि जिसकी गोद में देवी देवता  भी खेले ,,,,,नारी इंसानियत की जन्मदाता है ,,,,फक्र होता है स्वयं पर कि मैं  इस बार एक नारी के रूप में जन्मी ,,,,पर नारी होना सम्मान के साथ साथ एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ,,,,,नारी एक information  bank  है ,,,,,वह सिर्फ एक घर का ही नहीं बल्कि पूरे समाज का निर्माण करती है ,,,,,जिस तरह के संकल्प (thoughts ) उसके  मन में आते हैं  वह साकार होने लगते हैं ,,,,,,,,जब बच्चा गर्भ में होता है तो माँ की  मनोस्थिति का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है ,,,,,एक शरीर भोजन का सेवन  करता है पर एक आत्मा का भोजन उसके मन में जन्म लेने वाले विचार होते हैं ,,,,आत्मिक बीज  गर्भ में सिर्फ माता के  द्वारा परोसा गया विचारों का भोजन करता है ,,,,और भोजन पर ही उसकी सेहत निर्भर करती है ,,,,,आज बच्चे  भावनात्मक रूप से कमज़ोर (emotionally weak ) पैदा हो रहे हैं क्योंकि  माता के खान पान का , दवा दारु का ध्यान रखा जाता है पर उसकी मानसिक स्थिति नज़रअंदाज़ होती है ,,,,जो स्त्री घर चलाती है वह घर में भोजन पकाते और परोसते हुए अपने मन में उठने वाले सभी संकल्पों को परोसती है ,,,,,और कहते हैं ना जैसा अन्न वैसा मन ,,,,, सारा दिन टीवी सीरियल्स देखने के बाद उसका मन बहुत ही नकारात्मक information से भर जाता है और फिर उसी सामान से वह वैचारिक मंथन कर आत्मिक भोजन बनती है ,,,,,,अब उसके मन में उठने वाले विचार इस बात पर निर्भर करते हैं कि वह अपने मन को किस प्रकार की information  से भर रही है ,,,,,निंदा , चुगली , ईर्ष्या , अपमान , दोषारोपण आदि वह सड़ी गली सामग्री  है जिससे बना भोजन विनाशकारी है ,,,,,,,,,और यह भोजन सिर्फ स्त्री की ही नहीं अपितु पूरे परिवार की सेहत ख़राब करता है ,,,,,,,,,,,,,कहते हैं हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बनते हैं ,,,,,,एक अच्छी सोच की जन्मदाता है नारी ,,,,,,,,उसके विचारों की सही और सकारात्मक दिशा इस धरती को स्वर्ग बना सकती है ,,,,पर उसके लिए ज़रूरी है कि हर स्त्री इस बात का पूरा ध्यान  रखे कि वह स्वयं किस तरह की बातें सुनती और करती है और किस प्रकार के लोगों और माहौल में उसका अधिकतर समय बीतता है ,,,,,,,,,,,,,

सिमी  मदन  मैनी 

Sunday, 9 November 2014

जीवन ग्रन्थ

नमस्कार ,,,,

कल मेरा जन्मदिन था ,,,,हर बार की तरह एक खास दिन ,,,जिस पर वैचारिक मंथन करना ज़रूरी है ,,,कल मन में उपजे कुछ भाव आपके साथ बाँट रही हूँ ,,,,,,,,,,,,,,

    जीवन ग्रन्थ


एक दिन तुम्ही ने भेजा था
जाओ अपना जीवन ग्रन्थ लिखो
हाथ में थमाई थी कलम संस्कारों की
और बुद्धि की स्याही से डुबो  कर
जीवन के एक खाली पृष्ठ को भरना था

कल इस जीवन ग्रन्थ का
एक और अधूरा पन्ना पूरा हुआ
अब तक के 46 पन्नों में
समाये है जाने
कितने अनुभव ,ख़ुशी  और गम
कितनी  उपलब्धियाँ और गलतियाँ
आते जाते रिश्ते और बनते बिगड़ते काम

कौन जाने ? कितने पन्ने जुड़ने बाकी है
इस जीवन ग्रन्थ में
बहुत मुमकिन है कि
आज का यह संकल्प
इस जीवन ग्रन्थ पर लिखा
आखरी संकल्प हो

अब तक जो लिख डाला
उस पर तो कोई ज़ोर नहीं
पर आगे जो लिखना है
वो मेरे बस में है
आज से अपने मन से वादा है कि
 उसमें उपजा  हर संकल्प शुद्ध होगा
जो मेरे जीवन ग्रन्थ को
सुन्दर बना देगा
और
हर  कर्म परमात्मा को समर्पित  होगा

यह एक जीवन ग्रन्थ नहीं बल्कि
एक बैलेंस शीट है
जो लिखी है
अपने ही हाथों
पूरी ईमानदारी से
और इस लाभ हानि के खाते की
चैकिंग करने वाला
और कोई नहीं
परमात्मा है ,,,
सो इन्साफ भी सच्चा होगा

सोचती हूँ क्यों ना ?
वक़्त रहते अपनी कमज़ोरियाँ
सुधार लूँ
ताकि सही समय आने पर
अपने ही हाथों से
यह बही खाता बड़ी शान से
प्रभु को सौंप दूँ
इस उम्मीद के साथ कि
परिणाम अच्छा ही होगा
क्योंकी ,,,,,,,,,
मैंने इस ग्रन्थ का हर लफ्ज़
पूरी अटेंशन के साथ लिखा है

सिमी  मदन  मैनी
10/11/2014








Thursday, 6 November 2014

नमस्कार ,,,,

कल कहीं से लौट रही थी तो मंदिर के बाहर फूल वालोँ को देखा ,,,,, फूल खरीदने वालों की लम्बी कतार थी ,,,,रंग बिरंगे फूलों में कमल के भी बहुत सुन्दर फूल थे ,,,,थोड़े महेंगे ,,,,कई लोग उन फूलों को खरीद रहे थे ,,,,श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहते थे परमात्मा को ,,,,मैं  सोच रही थी कमल बाकी सभी फूलों से मेहंगा क्यों है ?,,,,,और हम इसे परमात्मा को क्यों अर्पित करते हैं जबकि यह कीचड़ की देन है ?,,,,,, शायद आज हम केवल एक रिवाज़ समझ कर पुष्प अर्पण करते हैं ,,,,,कमल एक ऐसा पुष्प है जो कीचड़ में पनपता है और अलग नज़र आता है ,,,,कीचड में रह कर भी वह अपनी पवित्रता और सुंदरता नहीं खोता ,,,,और इतना ही नहीं उसे देवी देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है ,,,,,ठीक उसी तरह हमें भी किसी भी तरह के हालत और लोगों में अपनी अलग पहचान बनानी होती है ,,,,कमल बनना आसान नहीं ,,,,निंदा , दोषारोपण , सड़ी गली मान्यताओं और संकीर्ण सोच के कीचड में अपनी अलग पहचान बनाए रखना एक  कठिन परीक्षा है ,,,,,जहाँ लोग सोचते कुछ  और हैं और बोलते कुछ और हैं वहां हमारी  चुप्पी हमें अकेला कर सकती है ,,,पर इसी में हम   न्यारे और प्यारे बन सकते हैं कमल की तरह ,,,,अलग सोचने वाले ही अपना अलग मुकाम बना पाते हैं अन्यथा हम  भी भीड़ का हिस्सा हैं ,,,,चूहों के रेस में अगर हम जीत भी गए तो भी चूहे ही रहते हैं ,,,,केवल वही बात कहें जो सोचते हैं अन्यथा चुप्पी बेहतर है और हर तरह की सड़ी  गली बातें सुन कर स्वयं को कूड़ेदान ना बना लें ,,,,,आज सारा अटेंशन इस बात पर है की हम ऊपरी तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं ,,,,कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं ?,,,किस तरह चलते फिरते , उठते बैठते हैं ?,,,,,पर किस प्रकार सोचते हैं इस बात पर प्रश्नचिन्ह है ,,,,,,सोच ही व्यक्तित्व की जड़ है ,,,आज अगर हम किसी भी महान व्यक्ति को याद करते हैं तो उसकी सोच की वजह से करते हैं क्योँकि यह सोच ही है कर्म कराती है ,,,,,सोच एक ऐसी ऊर्जा है जो हमारे  बोल से पहले सामने वाले तक पहुँच जाती है ,,,,और यही सोच या तो विध्वंस करती है और या तो निर्माण करती है ,,,,,,,,,,,,,,ईश्वर से सदा प्रार्थना करें की वह हमें इस कलयुगी कीचड में कमल बनने की शक्ति प्रदान करे,,,,

सिमी  मदन  मैनी


Wednesday, 5 November 2014

 नमस्कार ,,,


प्रत्येक व्यक्ति गुणों और अवगुणों का संगम है ,,,,कोई भी इंसान कभी बुरा नहीं होता ,,बुरे  होते हैं उसके कर्म ,,,,,,और कर्म संस्कारों पर आधारित होते हैं ,,,,,,,,,,कोई भी एक ऐसी आदत जिसे वक़्त रहते रोका  ना जाये  और जो हमें विनाश की और अग्रसर करे ,,,हमारा कड़ा संस्कार है ,,,,ऐसा कोई भी कड़ा संस्कार हमारी सभी अच्छाईयों पर पानी फेर देता है ,,,,,,उनमें से ज़िद एक है ,,,,,मुझे आज भी याद है जब मेरे  बच्चे  छोटे थे तो अक्सर दूसरों की देखा देखी कई बार ऐसी ज़िद कर बैठते थे जिसे उस समय पूरा करना उनका ही नुकसान करना था ,,,,,,,,,जिद करने का हर एक का तरीका अलग होता है ,,,,,,,,,जब हम बहला फुसला कर अपनी बात मनवाते हैं वह भी ज़िद है ,,,,या फिर हम कई बार झगड़ा कर बैठते हैं ,,,,,,,,,बच्चा दुकान पर खिलौने को देख कर उसे पाने के लिए या तो माँ से झगड़ता है और या फिर उसके पैरों से लिपट जाता है और चूमा चाटी करता है ,,,,,दोनों ही सूरतों में उसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ उस खिलौने को पाना होता है ,,,,पर एक माँ अपने बच्चे की ज़िद से भली भाँती परिचित होती है ,,,,,वह जानती है की उस समय उसे वह चीज़ लेकर देना एक और बड़ी ज़िद को जन्म दे सकता है और उसका ज़िद करने का संस्कार और कड़ा हो जायेगा ,,,,,,,ज़िद सदा विनाश की और अग्रसर करती है ,,,,,,,,,,,,,,रावण के पास अर्थ, ज्ञान , बल और भक्ति देवताओं से कई अधिक थे पर सीता को पाने की ज़िद ने ना सिर्फ उसका अस्तित्व मिटा दिया अपितु जन्म जन्मांतर उसके नाम पर धब्बा लगा दिया ,,,,,,,,,,,,,,,आज कोई अपनी संतान का नाम रावण नहीं रखता ,,,,,,,,,,कई बार हम भी अनजाने में परम पिता से किसी गलत चीज़ की ज़िद कर बैठते हैं ,,,,,पर हमें यह विशवास होना चाहिए की सही समय आने पर हमारा पिता हमें स्वयं आवश्यकता  के सभी स्थूल और सूक्ष्म साधन उपलब्ध कराएगा ,,,,,,नाम , मान , रिश्ते , सुख सुविधाएँ खुद हमारे पास चल कर आएँगी ,,,,,,,,,,,,,,इंतज़ार  और विश्वास करना सीखना भी ज़रूरी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब्र का फल सदा मीठा ही होता है

सिमी  मदन मैनी  

Tuesday, 4 November 2014


नमस्कार ,,

कल  बाबा  बुलेशाह  का एक कलाम  गुनगुना रही थी ,,,,,,,,,,,,,कितनी  गहराई है उनकी बातों में ,,,,,,,सोचा आप सबके साथ बाँट लूँ ,,,,,,,," जाग  बिना दुद जमदा नाहीं , पावें  लाल  होवे  कड  कड  के  ",,,,,,,,,बड़ी ही गहरी और सुन्दर  पंजाबी की पंक्ति है जिसका अर्थ है  चाहे दूध को आंच पर कितना ही लाल कर लेँ दही ज़माने के लिए उसमें थोड़ा  दही  मिलाना पड़ता है ,,,,,,,,,, आज दिन तक बहुत ज्ञान सुना ,,,,,,,भारी  भरकम ग्रन्थ पढ़े ,,,,,नियमित रूप से मंदिरों में हाज़री लगाई ,,,,,,पूजा अर्चना की ,,,,व्रत रखें ,,,,,अपने अपने धर्म में बताये गए सभी नियमों का विधिवत पालन किया ,,,,,,फिर कैसे उस परमपिता  से दूर हो गए ????,,,,,,कितनी ही कोशिश कर लें मक्खन से घी बनाने के लिए उसे आंच पर चढ़ाना ही पड़ता है ,,,,,,,,,,,उसी प्रकार  कितना ही श्रेष्ठ ज्ञान सुन लें जब तक उसे जीवन में उतारने कीई  क्षमता और साहस हम में नहीं है परमात्मा से दूरी बनी  रहेगी ,,,,,,,,,,,आज हम गीता को सुनते हैं , गीता की नहीं सुनते ,,,,,,,महान ग्रंथों को सुनते हैं , महान ग्रंथों की नहीं सुनते ,,,,,माँ छोटे  बच्चे को पढ़ा रही है  " सदा सच  बोलो " ,,,,और जैसे  ही दरवाज़े पर दस्तक होती है हम उससे कहते हैं जाओ कह दो मम्मी घर पर नहीं है ,,,,,,,,,,उसके तुरंत बाद हम घर में जोत जगाते हैं ,,,,,,,,जितना श्रेष्ठ  ज्ञान हमारे ग्रंथों में हैं उसकी एक बात को जीवन में उतारने में जन्मों बीत जाते हैं ,,,,,,,,,,,बचपन से सुनते सुनाते आये ,,,, सदा सच बोलो ,,,,,पर आज दूसरों से तो क्या ? खुद से भी सच नहीं बोल सकते ,,,,,,इसी लिए अपने आप से दूर हैं और सब कुछ होते हुए भी शांति और प्रेम का अनुभव नहीं करते और उसकी तलाश बाहरी  चीज़ों  में करने लगते हैं ,,,,,इसलिए जो भी सुनें और पढ़े उसे  एक नियम समझ कर ना करें बल्कि उसपर वैचारिक मंथन ज़रूरी है अन्यथा यह स्वयं को ईश्वर को धोखा देना है ,,,,,,,,,


सिम्मी मैनी 

Sunday, 2 November 2014

जीवन का हर एक क्षण कुछ ना कुछ झोली में डाल जाता है ,,,,इस जीवन रंग मंच पर घटने वाला हर पल कल्याणकारी है ,,,,,,,,हम कई बार इस गूढ़ रहस्य को समझ नहीं पाते और व्यर्थ चिंतन करते हैं ,,,,,,,बीता  हुआ हर पल या तो हमें खुद से मिला देता है और या फिर सामने वाले व्यक्ति को परखने की क्षमता को बढ़ता है ,,,,,,,, अकसर जो घटना हमें अप्रिय लगती है उसके घटित होने के पीछे कोई ऐसा भेद होता है जिसे खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता ,,,,,,यदि हमारा ईश्वर पर अटूट विश्वास होता है तो हमें हर पल को उसका प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेना  चाहिए ,,,,कठिन परिस्थितियों में ही व्यक्ति को अपनी क्षमता का एहसास और अपने और पराये की परख  होती है ,,,,,,कभी यह ना कहें की समस्या बड़ी है बल्कि समस्या से कहें कि मेरा प्रभु बड़ा है ,,,,,,,,,,जीवन में हम अक्सर ऐसे लोगों से रिश्ता कायम करते हैं जो धन , मान , ओहदे में हमसे अधिक बलशाली हों ,,,,,,,,,,,,हम उनकी ताकत को अपनी ताकत समझ बैठते हैं और उसके बल पर अनैतिकता के मार्ग पर कब कदम बढ़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ,,,,हम धन और ताकत के बल में चूर स्वयं से दूर हो जाते हैं ,,,,,,,,,,,,,,रिश्ते कभी भी किसी शर्त और मतलब की नींव  पर नहीं पनपते ,,,,,,,,,,,,,रिश्ते तो दिल से बनते हैं ,,,,,,,,,,,,,,,दुनिया में किसी इंसान की इतनी हैसियत नहीं की वह हमारे लिए कुछ कर सके ,,,,,,,,,,,,मदद भी ईश्वर का इशारा होने पर ही नसीब होती है ,,,,,,,,,,,,,,सबसे बड़ा मददगार वो है ,,,,,,,मदद लेने की क्षमता हममें खुद में होनी ज़रूरी है ,,,,,,,,,,,,,,कहते हैं शेरनी का दूध केवल सोने के बर्तन में रख सकते हैं अन्यथा वह बर्तन फाड़ देता है ,,,,,,,ईश्वर से मदद हासिल करने की लिए हमें उस सोने के पात्र  की तरह बनना होता है ,,,,,,, आडंबर  करने की जगह उससे रिश्ता कायम करना पड़ता है ,,,,,,,,,,,,एक बार एक व्यक्ति ने एक पहलवान से दोस्ती की जोकि  बहुत बलशाली था ,,,,,,,,,,,,,,,,,और अपने  सच्चे मित्र को सदा अनदेखा किया ,,,,,,उसे सदा लगता की कठिन हालत में पहलवान से मदद मिलेगी ,,,,,,,,,,,,,,,,,एक दिन इस व्यक्ति के घर में आग लग गयी ,,,,,ईश्वर की  माया देखिये  उस दिन पहलवान घर पर नहीं था ,,,,,,,,,,,,,,,,,कमज़ोर मित्र   चीखें सुन कर पानी की बाल्टी लेकर  भागा ,,,,वह घर तो ना बचा  सका पर उस दो बाल्टी पानी ने उस व्यक्ति की जान बचा दी ,,,,,,,और उसे ईश्वर ने एक अनमोल पाठ पढ़ा दिया कि उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता  और मित्रता का आधार रुतबा या शानो शौकत नहीं बल्कि प्रेम है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सिमी  मदन  मैनी