Thursday, 24 May 2012

दाग ,,,,,,,,,



    दाग 

चांदनी तो तुम्हारी
कहलाती  है सदा
और मान भी पाती है,,,,,
पर,,,,,,,,,,,,,
ऐ चाँद !!!!!
मैं तुम्हारे 
चेहरे का 
वो दाग हूँ
जो खुद 
बदनाम होकर 
तुम्हे बुरी नज़र से 
बचाता है,,,,,,,,
और यही प्यार है,,,,,
हाँ!!!!!!!!!!!!
यही प्यार है,,,,,
और 
हर प्यार करने वाले को
अपनी मंजिल मिले 
ये ज़रूरी तो नहीं,,,,

सिमी मैनी 

Tuesday, 22 May 2012

वजूद .....





     वजूद 

लोग तो यूँ ही
आसमान को छूने 
के लिए इतनी 
जद्दो जहेद करते हैं
मैंने तो पहले से ही
अपने ख्वाबों और ख्वाहिशों को
आसमान में टांका है
ये जो ज़री वाला आसमान 
चमकता है ना,,,,
दरअसल ,,,
मेरा वजूद है

ये समेटे है
मेरी हर इच्छा 
और आशा को
जो रोज़ रात
टिमटिमाती है
और अपने होने का 
एहसास दिलाती है

आत्मा जो चाँद सी 
चमकती है
करती है पहरेदारी
मेरे सपनों की
डरती है ,,,
कहीं थक कर
मेरी कोई खवाहिश 
सो ना जाये,,,

क्या आपका वजूद भी
इस विस्तृत गगन सा
विशाल है?
जो,,,,,,
परिस्तिथियों के 
गरजते बादलों
और दर्द की कड़कती 
बिजली से भी
विचलित नहीं होता 
और उम्मीद के 
हर तारे को 
सहेज कर
रखता है

सिम्मी मैनी 

Wednesday, 16 May 2012

छाप ,,,,,

    छाप 

इस धड़कते दिल ने कभी
उम्मीदों के फर्श  पर 
ख्वाबों की खूबसूरत 
छाप छोड़ी थी
सूरज की पहली किरण  सी 
मासूम छाप,,,,,
ओस की पहली बूँद सी
पवित्र छाप,,,,,
नए रिश्तों में
अपना वजूद बनाती
सहमी, भोली छाप
प्रेम के हर पड़ाव पर
जाना चाहती थी

और फिर,,,,,,,,,,
वक़्त के चलते
ख्वाबों के फर्श  पर 
असलियत की काई 
जमने लगी,,,
और रंगीन छाप  के
रंग फीके पड़ गए,,,,
खोजने लगी
वजूद  अपना
बेरहमी की तिलकन में,,,,
और फिर उसने 
चकनाचूर फर्श में
अपने  ही
वजूद के
टूटे  टुकड़ों का
अक्स देखा

सोचती हूँ
क्यों ना
एक बार फिर 
आशा के रंग में 
पैर डुबो लूं
और जिंदगी के फर्श  पर 
आशा के नए निशां 
बना लूं,,,,
की यह निशां ही तो
मेरी पहचान हैं

सिम्मी मदन  मैनी 

Tuesday, 15 May 2012

ज़िन्दगी.....

आज के  उन्वान **** ज़िन्दगी / जीवन **** पर मेरी एक रचना   " ज़िन्दगी "  पेश  है  ,,,,,,

    ज़िन्दगी

क्या तुम बता सकते हो?
कि,,,,
मेरी  ज़िन्दगी तुमसे
और,,,,
तुम्हारी ज़िन्दगी उससे
अलग क्यों है?
किसी की ज़िन्दगी है  रंगीन 
तो किसी की हसीन 
किसी की  है बेरंग 
किसी की मस्त मलंग
किसी की है दर्द 
तो किसी की सुकून
किसी की है उल्फत
तो किसी की जूनून

रब से तो 
मिला था सबको 
एक  सुन्दर शरीर 
और सोच का 
खूबसूरत केनवस 
हम ही ने 
अपने विचारों के
ब्रश को,,,,
संस्कारों के रंगों 
में डुबो कर,,,,
अपने अनुभव से
जो चित्र 
उस केनवस पर बनाये
बस वही ज़िन्दगी बन गए
और हम सबकी 
ज़िन्दगी की परिभाषा 
एक दूसरे से
अलग हो गयीं          

सिम्मी मदन  मैनी        

Wednesday, 9 May 2012

जाने क्यों ?,,,,



जाने क्यों ?
आज  आँख
फिर से नम 
और दिल 
परेशान  है 
लगता है
वक़्त की सुई में 
क्षमा का धागा 
डाल कर
अतीत के 
जिस ज़ख़्म को
सिया था कभी
उसका कोई टांका
आज,,,,,,
किसी भारी चोट से
उधड़ गया है
और घाव फिर से
रिसने लगा है 

सिम्मी मैनी 

Sunday, 6 May 2012

मोह ....

     मोह 

जब भी कोई कहता है
वाह! क्या खूबसूरत वृक्ष  है 
तो झूम उठता है वृक्ष 
और पत्ते 
खिलखिलाने लगते हैं
ख़ुशी से,,,
लिपट  जाती हैं डालियाँ
और फल  भी
अपनी मिठास  पर 
इतराने लगते हैं
 गर्व से और भी 
तन जाता है तना 
और सब ही 
अपने  अपने गुणों की
गौरव गाथा सुनाने लगते हैं
मिल कर सभी घंटो 
चेह्चाहते हैं
अपनी प्रशंसा का
जश्न  मानते हैं

शायद ,,,,,
भूल  जाते हैं मुझे
मैं उपेक्षित जड़ यहाँ 
मिटटी  में जो दफ़न हूँ
आज भी इन्हें
अपने  खून से
सींचती हूँ
मेरे  अपने हैं  ना

तभी मुझ पर होता है
खुरपी का मज़बूत वार
मेरी सांस थम सी जाती है
झेल लेती हूँ उसे भी
मुस्कुरा कर
ताकि ये सब
सांस ले सकें

कोशिश करती हूँ
खुद को बचाने की
आज  भी,,,
कि
मेरे दम तोड़ते ही
इस अभिमानी वृक्ष  का 
वजूद मिट जायेगा
पता नहीं
मुझे किनारा करने वालों से
मुझे इतना मोह क्यों है?

सिम्मी मैनी