Wednesday, 25 April 2012

कलम .....

    कलम 

क्यों होता है ऐसा
कभी  कभी,,,
कि,,,,,
कलम कुछ नहीं
लिख  पाती 
क्या वो भी
थक जाती है 
नहीं ,,,,,,नहीं,,,,,
शायद मेरे ही मन में
विचारों की स्याही 
थकान की बर्फ से 
जम जाती है

दुनियादारी की तीखी 
सर्द हवाओं  से
ठिठुरने लगता है 
दिलो दिमाग,,,
और हार कर
खुद को
अकेलेपन की चारदीवारी में
बंद कर लेता है
शायद एकांत में
रहना चाहता है
कुछ पल,,,,

और कुछ देर बाद
यही बांवरा मन
ख़ामोशी में
किसी हरकत की
आवाज़ सुनना चाहता है
सन्नाटे की खिड़की
खोलता है दिमाग

और अब,,,,
कलम में जमी 
विचारों  की 
पत्थर सी स्याही
जीने के जस्बे की 
मंद आंच  से 
पिघल जाती है
और कलम 
एक  बार  फिर 
रफ़्तार पकड़ लेती है,,,,,,,,,
क्या आपके साथ भी  
ऐसा ही होता है?

सिम्मी मैनी 

Sunday, 15 April 2012

भूख ............

    भूख 

उफ्फ्फ!!!!
यह भूख  भी 
इंसान को
क्या से क्या 
बना देती है
इतनी बलवान 
है यह भूख
कि उसूलों ,आदर्शों को
जड़ से हिला देती है

भूख पेट की
सम्मान की
प्रशंसा की
पहचान की
धन की
मान की
तालियों की
गडगडाहट की
नाम की

जब लेती है
भूख अंगड़ाई 
तो तूफ़ान 
आते हैं
और इस ज़लज़ले में
कमज़ोर लोग
अपना अच्छा बुरा
कहाँ सोच पाते हैं?

गिरवी होते हैं ज़मीर
और हम
नामुराद भूख के
गुलाम बन जाते हैं
बस शांत करनी है भूख
और आगे बढ़ना है
क्या हमें अपने स्वाभिमान 
की कब्र पर
अपनी खोखली 
पहचान का
नया इतिहास गढ़ना है??

सिम्मी मैनी         भूख 

Wednesday, 11 April 2012

रिमोट .....

      रिमोट 

कुर्सी पर बैठी 
घर के सदस्यों को
टीवी के रिमोट के लिए
झगड़ते देख रही हूँ
कर कोई करना चाहता है
उस पर कब्ज़ा
वरना......
दूसरे की पसंद का चैनल 
मन नहीं भायेगा

सोचती हूँ?
टीवी के रिमोट की इतनी चिंता?
और जो ज़िन्दगी का रिमोट 
दूसरों के हाथ में है?
सामने वाले ने जब चाहा
बस एक बटन दबाया
कभी हमें हंसाया 
कभी रुलाया
कभी सताया
कभी दर्द दिया 
कभी उकसाया 
कभी गुस्सा दिलाया 
बस उसकी एक बात
और हम आपे से बाहर

काश!!!  
हम  टीवी के रिमोट की तरह
जीवन का रिमोट संभाल लें
तो जिन्दगी हमारी ताल पर नाचे 
विचारों का नियंत्रण 
हमारे हाथ
और 
आत्म ज्ञान का एक घेरा 
हमारे चारों और बन जाये 
इसके अन्दर बस 
वही विचार आये
जो हम चाहें
और अब 
जिंदगी में चलें सिर्फ
हमारी पसंद के चैनल 

सिम्मी मैनी       

Wednesday, 4 April 2012

त्याग ......

      त्याग 

क्या वो त्याग था?
कभी सपने का 
कभी अपने का
कभी सोच का
कभी स्वाभिमान का
कभी पसंद का
कभी धन का
कभी शौक का
कभी शरीर का
कभी रोटी का
कभी रिश्ते का
कभी लफ्ज़ों का
कभी भावनाओं का
कभी घूमने का
कभी विद्या का
कभी उम्मीदों का
कभी बचपन का

कई बार सोचती हूँ
मैंने कई बार
इन  सबको छोड़ा
बिना कुछ बोले
कभी प्रेम के चलते
कभी फ़र्ज़ समझकर
कभी ईश्वर के डर से
सुना था की त्याग 
महान होता है

पर जिसे मैं त्याग 
समझ  बैठी 
वो सच में त्याग था?
या फिर कोई मजबूरी
चैन से जीने की?
या फिर 
आपका कहना ही ठीक है?
कि वो मेरा फ़र्ज़ था

अगर वो फ़र्ज़ भी था
तो उस फ़र्ज़ कि उम्मीद
सबने मुझसे कि
पर उसे निभाने में 
कोई खरा नहीं उतरा

सिम्मी मदन  मैनी     

Tuesday, 3 April 2012

एहसास ....

         एहसास

उन्मुक्त बहती है मेरी सोच
और...
हर बार दिल में जाकर 
किसी एक एहसास के 
दरवाज़े पर .... 
दस्तक देती है

कभी प्रेम
कभी घृणा 
कभी दर्द
कभी इर्ष्या
कभी सुकून
कभी क्रोध 
कभी ममता 
कभी करुणा

एहसास से मिलते ही
सोच उसके रंग में 
रंग जाती है
रूह जीती है उस एहसास को
और फिर जब 
एहसास कल्पना का जामा पहन 
कागज़ पर बिखरता है 
तो आप उसे मेरी 
आपबीती समझ लेते हैं 

सिम्मी मैनी 

कैसा शोर???



    कैसा शोर?

उफ़ !!!!!!!!
कैसा शोर विचारों का यह?
जो नींदें भी चुराता है
सब कुछ होते हुए भी 
इंसान याचक बन जाता है
रात ना बीते 
कितने ही जतन कर
और....
मखमल का बिछौना भी
शूल शैया हो  जाता है

झगड़ते हैं सभी विचार मन में
भूत और भविष्य के
और इस कोलाहल में
बेचारा वर्तमान 
बहुत ही डर जाता है

काश मिल जाए 
सुकून कि कपास कहीं
तो शायद 
आत्मा के कानों को
कुछ आराम मिल जाए
ज़रा सुस्ता लें सभी संकल्प
पल भर को...
और मुमकिन है कि 
वर्तमान को जीने की
राह मिल जाए

सिम्मी मैनी     

सपना ...........


   सपना 

मैं तुम्हारा सपना
बरसों पुराना
अभी जीवित हूँ
दिल के किसी कोने में 
दुबका हुआ
एक सुलगती चिंगारी
जिसे वक़्त कि हवा
नसीब ना हुई

जाने कितनी चिकित्सक
गायिका ,नर्तकी
लेखिका ,कवियत्री
और अध्यापिका 
इन सपनों में कैद हैं

दोष मुझे मत देना
कसूर मेरा नहीं
क़ाबलियत भी थी तुममे
और डोर भी 
तुम्हारे हाथ थी
पर तुम्ही ने कहा
इन सबको मरना होगा
ताकि तुम अपना वजूद मिटा कर
 हर किसी को खुश रख सको
पर ऐसा हो ना सका
जानती हो क्यों ?
क्योंकि तुम खुश नहीं थीँ


सिम्मी मदन  मैनी