Thursday, 28 June 2012

मेरा मकान खाली करो

मेरा मकान खाली करो 

भाई !!!
बड़ा डंका बजता है
तुम्हारे नाम का
और,,,,
खूब मान भी पाते हो
बचपन से बच्चों को
घुट्टी की तरह 
पिलाये जाते हो 

घुट्टी का काम किया है
तो दौड़ते हो ,,,,
इन रगों में भी
पर,,,,,,,
बड़ी अजीब बात है 
ऐ ! सत्य
तुम पनाह भी
मुझमें लेते हो
और,,,,
साथ भी नहीं निभाते

जिस जिस्म से,,,,
तुम्हारी सांसें चलती हैं
उसका तो कुछ
मान करो,,,,
बस हर बार 
यही कहते हो
"मेरा साथ सरल नहीं
पर,,,
अंतिम जीत मेरी"

अब बस भी करो
और मत बनाओ  मुझे 
सालों बीते ,,,,
अरे अब तो,,,
मेरा जाने का 
वक़्त हुआ
या तो अपनी
जीत का जलवा 
दिखाओ  मुझे 
नहीं तो चलो,,,,,
जल्दी से,,,
मेरा मकान खाली करो
मेरा मकान खाली करो 

सिम्मी  मैनी

29 जून , 2012

Wednesday, 27 June 2012

ख्वाब

   ख्वाब

मेरी दुआ है कि
कोई आँख 
रूखी ना रहे
हर आँख में हरदम
एक बड़ा ख्वाब
तैरना चाहिए
हर बड़ी उपलब्धी 
हर बड़ा बदलाव
पहले एक ख्वाब था
जो किसी दिलवाले ने देखा

कौन जानता था कि 
हम हवा में परिंदों से
उड़  पाएंगे ,,,,,
या फिर कभी चाँद की
सैर को जाएँगें,,,,
यह भी तब 
एक  खवाब होगा
एक धुंदली तस्वीर
जिस में किसी ने
विश्वास के रंग भरे होंगे 
और हिम्मत के केनवस पर 
बनी इस तस्वीर ने,,,
उस ख्वाब पर हंसने वालों के 
मुँह  सी दिए होंगे,,,,,

तो क्यों ना हम भी
दिल ख़ोल के सपने देखें 
जाने किसने कह दिया ?
जितनी चद्दर उतने पैर पसारो
मैं  तो कहती हूँ 
चलिए,,,,,,
हम  अपनी 
सोच  की हदों को बढ़ा कर
 अपने ख्वाबों की चद्दर को
 इतना  बड़ा कर लें कि
तमाम खुशियाँ भी
उसमें समाने को
कम पड़ जाएँ 

यकीन मानिये 
मैं झूठ नहीं कहती
ये सपने ही हैं
जो एक दिन 
हकीकत बन जाते हैं
मेरी आँखें तो किसी 
बड़े सपने की
तलाश में हैं 
क्या आपकी आँखों में  भी
कोई बड़ा सपना तैरता है?

सिम्मी मैनी 

अनजान मुसाफिर

       अनजान  मुसाफिर 

रेलगाड़ी कि पटरी को तकती 
मेरी थकी, सपाट ,शुष्क आँखें 
भविष्य की उलझनों में उलझी 
और,,,,,,,,
पटरी और गाड़ी के बीच
मानो चीखते  सवाल
जो सीना चीर रहे हैं 
क्या करूँ ?
 कैसे करूँ?
कल क्या होगा?
कैसे होगा ?

और  वहां ,,,,,,,
सामने की बर्थ पर
एक अनजान मुसाफिर
थोडा मगरूर
थोडा अभिमानी
और,,,
थोडा मशीनी
लाख़ों ,करोडो के हिसाब में उलझा
लेपटाप और फोन से चिपका
लंच में इंसुलिन के इंजेकशन  खाता 

बहनजी ,,,,,
ये ज़मीन देखती हैं?
जहाँ तक नज़र जाती है
सब मेरी है,,,,,
अभी मुंबई में
 फलां जमीन का सौदा है
उसकी बंद आँखों से 
अरबों ,खरबों के सपने 
झांक रहे थे,,,,,,

मेरा हाथ उसके काँधे पर
और मैं बोली 
भाई साहब ,,,,,
स्टेशन  आ गया,,,,,,,,,,,,,
उफ्फ़!!!!
अनजान मुसाफिर का सफ़र 
यहीं खत्म हुआ,,,,,,,,,
अब,,,,,,,,,,
शून्य  में चीखती आवाजें 
अरे देखो कौन है?
कहाँ से आया है?
अरे भाई !
कोई वारिस है?
या यहीं दफना दें,,,,,,,,,,

मैं सोच रही हूँ
किस भविष्य की चिंता ?
आज अनजान मुसाफिर
वर्तमान में,,,,
जीना सिखा गया 
वर्तमान में,,,,,,
जीना सिखा गया 

सिम्मी मैनी 

Friday, 15 June 2012

चौखट ,,,,,,,,,,,

   चौखट 

चौखट के उस पार 
वो खड़ी अकेली 
कुछ सहमी सी
मुरझाई सी
हर छोटी बात की
सफाई देती,,,,,,,,
जिंदगी के
टूटे टुकड़ों को समेटती 
हर पल खुद से लड़ती
तो  कभी,,,,,,,
आस  भरी नज़रों से
हम औरतों को देखती 

और ,,,,,,,
चौखट  के इस पार
हम सब औरतों की 
भारी तादाद
तमाशा देखती 
बहुमत के साथ  चलती 
घिसी पिटी लकीरों को
पीटती ,,,,,,,
इर्ष्या की आग में जलती 
सिर्फ,,,,,,,,
ऊपर वाले के नाम की
दुहाईयां देती
यहाँ,,,,,,,,,,
एक नारी दूसरी नारी
के सम्मान का हरण करती
अपनी जिम्मेदारी से भागती 
और सिर्फ ,,,
पुरुषों पर दोषारोपण करती
यह भूल कर,,,
की कल,,,
हममें में से भी
कोई एक कभी 
चौखट के उस पार
हो सकता है,,,,,,,,,

सिम्मी मैनी 

Saturday, 2 June 2012

पाठ ,,,,,

हाँ ! हाँ !
आप ही से कह रही हूँ
आभार !!!
मुझसे टकराने का
मेरा दिल दुखाने का
दुखी मत होना तुम
मेरे घाव देख कर
कि,,,,,
यह तो वक़्त कि मरहम से
भर ही जायेंगे ,,,
शुक्रिया ! तहे दिल से
जीवन का नया 
पाठ पढ़ाने का

सिम्मी मैनी 

स्त्री .........

 
 स्त्री 

मैं स्त्री
त्याग के कोयले में 
जलाकर खुद को
तुम्हारे जीवन की 
सिलवटें  निकालती
एक इस्त्री की तरह

तुम्हारा जीवन तो
संवर गया 
मेरे सपनों के
जलने से
और कायदे से
जिंदगी की
अलमारी  में
सज भी गया 

पर एक बात जान लो
अगर मैंने खुद तप कर
तुम्हे नहीं संवारा तो
तुम्हारे मुचड़े 
अस्तित्व की गठड़ी 
यहीं कहीं पड़ी
नज़र आएगी
घर के किसी कोने में 

सिम्मी मैनी