मिल नहीं सकते
क्यों तुमसे
खत्म हो जाती है?
क्यों शब्दों का
आकाल पड़ जाता है?
क्यों आँख भर आती है?
क्यों लड़खड़ाने लगती है जुबान ?
क्यों लगता है कि
बस तुम आज समझ जाओगे
हाथ थाम लोगे मेरा
और मेरी किसी बात को सराहोगे
रख दूँगी तुम्हारे काँधे पर सर
और सब भूल जाऊँगी
आँख मूँद चल पडूँगी पीछे
तुम जो भी राह दिखाओगे
तुम आ भी जाते हो
तेज़ हो जाती है धड़कन
मैं एकटक देखती हूँ तुम्हे
तुम पूछते भी हो
कुछ कहना है क्या?
और मैं पत्थर कि मूरत
सर हिला कर कहती हूँ
नहीं कुछ नहीं
तुम फिर मसरूफ हो जाते हो
और मैं सोचती हूँ
क्या तुम कभी
मेरी आँखों और साँसों की
भाषा पढ़ पाओगे?
या फिर यूंही
गुज़र जाएगी ज़िन्दगी हमारी
नदी के दो किनारों की तरह
जो तेज़ वेग से बहती ज़िन्दगी को
समेट तो सकते हैं
पर कभी मिल नहीं सकते
सिम्मी मदन मैनी

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