यह रचना मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि यह मैंने अपने माता पिता की शादी की ४४वीं वर्षगांठ के लिए लिखी है .....आज २२ जनवरी ,२००१२ को मैंने यह रचना लिखी ........
यह रचना मेरी और से उन्हें एक छोटी सी भेंट है -
रिश्ते को क्या नाम दें?
आज के खास दिन पर
कुछ तो कहो
आप ही बताएं कि जीवन के
४४ सालों को शब्दों में
बाँधना आसन है क्या?
कहाँ से शुरू करूँ ?
जब से होश संभाला
आप दोनों को ऐसा ही पाया
कभी लड़ते झगड़ते
तो कभी बतियाते
कभी शिकायत करते
तो कभी मानते
ना कोई झूठ
ना कोई दिखावा
और मम्मी आज भी
इतने बड़े बच्चों को देती है
पापा के नाम का डरावा
आज भी कहीं जाने से पहले
मम्मी पापा को
धीरे बोलने का पाठ पढाती है
पर आज भी पापा की
ऊँची आवाज़ सुनने में आती है
मम्मी आज भी पापा से कहती है
मैं तो बच्चों कि वजह से टिक गयी
कोई और होती तो कभी ना रहती
यह तो मैं हूँ जो सब सह गयी
कोई और होती तो कभी ना सहती
पर अगर आज भी हम पापा को
गलती से भी कुछ कह दें तो
मम्मी आपे में ना रहती
पापा आज भी मम्मी को
खूब दौडाते हैं
रात १२ बजे आज भी
बेसन का हलवा बनाते हैं
मम्मी से नज़रें चुरा कर
आज भी उन्होंने साथ कैसे निभाया
उसकी कहानी सुनाते हैं
मम्मी थक तो जाती है
पर फिर भी पापा का
पूरा साथ निभाती है
पापा आज भी कई बार
मम्मी पर भड़क जाते हैं
पर देखिये ना
आज भी मम्मी के बिना
कही नहीं जाते हैं
आज भी जब मम्मी
गहरी नींद में होती है
तो बस पापा कि एक आवाज़
कृष्णा ...सुबह पेट साफ़ नहीं होता
गरम दूध का गिलास टाइम पे दिया कर
मम्मी को जगाने के लिए काफी है
मैं चाहती तो थी कि
सुनहरे शब्दों को
प्यार कि चाशनी में घोल कर
एक ऐसी कविता रच पाती
जो आपको स्वपनलोक में ले जाती
और बरबस ही आप के मुख से निकलता
वाह! क्या रिश्ता है
पर ऐसा कर ना सकी
क्योंकि
मैं समझती हूँ
यह रिश्ता ना तो फ़िल्मी है
और ना ही परफेक्ट
इतने सालों में मैंने तो बस इतना जाना कि
यह रिश्ता बरसों के साथ का है
हर सुख में और हर दुःख में
एक होने के एहसास का है
शायद यह रिश्ता
ख़ूबियों और खामियों का
अदभुत संगम है
अब आप ही बताएं
इस रिश्ते को क्या नाम दें?
सिम्मी मैनी
No comments:
Post a Comment