रिश्तों की बिसात
जब रिश्तों की बिसात
तो छलनी होते हैं अपने
कभी सुनते थे कि
रिश्ते दिल से
बना करते हैं
पर अब यह काम
दिमाग करता है
मोहरे हैं हम सब
और हर मोहरा
गिरगिट कि तरह
रंग बदलने में माहिर
छल या बल से
बस जीतनी है बाज़ी
हर चाल इस बात पर
निर्भर करती है
कि
कब, कहाँ, कैसे
कितना फ़ायदा होगा
कोई ढाई कदम
प्रेम के चलता है
तो कोई
एक कदम नफरत का
कोई सच्चाई से
चलता है सीधा
तो कोई फरेब में
तिरछा
मकसद बस एक ही है
शै और मात......
कोई चालाकी से
बच निकलता है
तो कोई छल से
मार गिराता है
निश्चित है इस बाज़ी में
किसी एक कि जीत
मुमकिन है
हममे से कोई एक
जीत जाये
कि हम सब हैं
चाल चलने में माहिर
पर फिर भी
यह आखरी फैसला
ना होगा
यह बाज़ी तो
छोटी बाज़ी है
ज़िन्दगी कि बिसात पर
फैसले कोई और
करता है
वक़्त के धागे से
बंधा है
हर मोहरा
और डोर उसके हाथ में
जिस तरह हवा का
रुख बदलता है
कभी भी पलट सकता है
वो बाज़ी
और एक दिन
हममे से हर एक को
देना पड़ेगा उसे
हर चाल का जवाब
तो अपनी चाल
संभल कर चलना
क्योंकि
गलत चाल कि सज़ा भी
गहरी होगी....
सिम्मी मैनी

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