वो दो कमरे
हाँ ! यह वही गली है
जहाँ बड़ा हुआ बचपन
वही सीढियां जो हमें
यौवन तक ले गयीं
वही दो कमरे जहाँ
बिखरी हैं पुरानी यादें
वही बिना पल्लों की अलमारी
जहाँ हम सब cousions
फँस कर सो जाते थे
पूरी रात हल्ला मचाते हुए
राजमां चावल खाते थे
फिर सुबह उठने का
मन नहीं होता था तो
माँ से दो चार
करारी गलियां पड़ती थी
और हम पेट दर्द का बहाना कर
स्कूल की छुट्टी मार जाते थे
वही रसोई
जिसकी shelf पर बैठ कर
माँ के हाथ की गरमागरम
रोटियां नसीब होती थी
वही बाथरूम
जहाँ सुबह लाइन लगती थी
और हम धक्का मार कर
अन्दर घुस जाते थे
वही कूलर
जिसके सामने सोने को
झगड़ते थे
और सामने सोने पर
जीत का जश्न मानते थे
वो देखिये
सीढ़ियों के नीचे पड़ी साईकल
जिस पर हम बारी बारी
स्कूल जाते थे
वो जो ट्रंक है
उसमे चार जोड़ी कपडे
हुआ करते थे
जिन्हें पहन कर
हम खुद पर इतराते थे
हर बार मुझ ही को
नया कोट मिलता था
और मेरे भाई
छोटे होने का
अफ़सोस मानते थे
कभी नंबर अच्छे आते थे
तो gaylord की आइसक्रीम मिलती थी
और हम मिल बाँट कर
खाते थे
हम भाई बहनों की
मद्धयमवर्गीय आंखों ने
कुछ ऊंचे सपने देखे
सपनों की नियत साफ़ थी
सो पूरे भी हुए
आज सब कितना बदल गया
दो कमरों की जगह
दस कमरे हो गये
हर कमरे में ac
और अटैच बाथरूम
खाना खाने को डाइनिंग टेबल
बड़ी गाड़ी
कपड़ो से लबालब भारी अलमारी
और बहुत सारा अकेलापन .........
हमने सपनों की सच्चाई का
स्वाद भी चखा
और वो सब पाया
जो कभी चाहा था
पर आज भी
हमारी मुस्कराहट
उन दो कमरों में कैद है............
सिम्मी मैनी



