Tuesday, 31 January 2012

वो दो कमरे..........

     वो दो कमरे
हाँ ! यह  वही गली है
जहाँ बड़ा हुआ बचपन
वही सीढियां जो हमें
यौवन तक ले गयीं
वही दो कमरे जहाँ
बिखरी हैं पुरानी यादें 

वही बिना पल्लों की अलमारी 
जहाँ हम सब cousions 
फँस कर सो जाते थे
पूरी रात हल्ला मचाते हुए
राजमां  चावल खाते थे
फिर सुबह उठने का 
मन नहीं होता था तो
माँ से दो चार
 करारी गलियां पड़ती थी
और हम पेट दर्द का बहाना कर
स्कूल की छुट्टी मार जाते थे

वही रसोई 
जिसकी shelf  पर बैठ कर
माँ के हाथ की गरमागरम 
रोटियां नसीब होती थी 

वही बाथरूम 
जहाँ सुबह लाइन लगती थी
और हम धक्का मार कर
अन्दर घुस जाते थे

वही कूलर 
जिसके सामने सोने को
झगड़ते थे
और सामने सोने पर
जीत का जश्न मानते थे

वो देखिये 
सीढ़ियों के नीचे पड़ी साईकल
जिस पर हम बारी बारी
स्कूल जाते थे
वो जो ट्रंक है
उसमे चार जोड़ी कपडे 
हुआ करते थे
जिन्हें पहन कर
हम खुद पर इतराते थे
हर बार मुझ ही को
नया कोट मिलता था
और मेरे भाई
छोटे होने का 
अफ़सोस मानते थे

कभी नंबर अच्छे आते थे
तो gaylord की आइसक्रीम मिलती थी
और हम मिल बाँट कर 
खाते थे

हम भाई बहनों की 
मद्धयमवर्गीय  आंखों ने
कुछ ऊंचे सपने देखे
सपनों की नियत साफ़ थी
सो पूरे भी हुए

आज सब कितना बदल गया
दो कमरों की जगह
दस कमरे हो गये
हर कमरे में ac 
और अटैच बाथरूम 
खाना खाने को डाइनिंग टेबल 
बड़ी गाड़ी
कपड़ो से लबालब भारी अलमारी
और बहुत सारा अकेलापन .........

हमने सपनों की सच्चाई का
स्वाद भी चखा
और वो सब पाया
जो कभी चाहा था
पर आज भी
हमारी मुस्कराहट
उन दो कमरों में कैद है............

सिम्मी मैनी 

मिल नहीं सकते...........

     मिल नहीं सकते

क्यों तुमसे
बात शुरू होने से पहले ही
खत्म हो जाती है?
क्यों शब्दों का 
आकाल पड़ जाता है?
क्यों आँख भर आती है?
क्यों लड़खड़ाने लगती है जुबान ?
क्यों लगता है कि 
बस तुम आज समझ जाओगे 

हाथ थाम लोगे मेरा
और मेरी किसी बात को सराहोगे
रख दूँगी तुम्हारे काँधे पर सर 
और सब भूल जाऊँगी
आँख मूँद चल पडूँगी पीछे 
तुम जो भी राह दिखाओगे 

तुम आ भी जाते हो
तेज़ हो जाती है धड़कन 
मैं एकटक देखती हूँ तुम्हे
तुम पूछते भी हो 
कुछ कहना है क्या?
और मैं पत्थर कि मूरत
सर हिला कर कहती हूँ
नहीं कुछ नहीं

तुम फिर मसरूफ हो जाते हो
और मैं सोचती  हूँ
क्या तुम कभी
मेरी आँखों और साँसों की
भाषा पढ़ पाओगे?
या फिर यूंही 
गुज़र जाएगी ज़िन्दगी हमारी
नदी के दो किनारों की तरह
जो तेज़ वेग से बहती ज़िन्दगी को
समेट तो सकते हैं
पर कभी मिल नहीं सकते 

सिम्मी मदन  मैनी 

Wednesday, 25 January 2012

रिश्तों की बिसात ..............

   रिश्तों की बिसात 

जब रिश्तों की बिसात 
बिछती है.........
तो छलनी होते हैं अपने
कभी सुनते थे कि
रिश्ते दिल से
बना करते हैं
पर अब यह काम
दिमाग करता है

मोहरे हैं हम सब
और हर मोहरा
गिरगिट कि तरह
रंग बदलने में माहिर 
छल या बल से
बस जीतनी है बाज़ी

हर चाल इस बात पर
निर्भर करती है
कि 
कब, कहाँ, कैसे 
कितना फ़ायदा होगा 
कोई ढाई कदम
प्रेम के चलता है
तो कोई
एक कदम नफरत का
कोई सच्चाई से
चलता है सीधा
तो कोई फरेब में 
तिरछा 

मकसद बस एक ही है
शै और मात......
कोई चालाकी से
बच निकलता है
तो कोई छल से
मार गिराता है

निश्चित है इस बाज़ी में
किसी एक कि जीत
मुमकिन है
हममे से कोई एक
जीत जाये 
कि हम सब हैं
चाल चलने में माहिर
पर फिर भी
यह आखरी फैसला 
ना होगा
यह बाज़ी तो
 छोटी बाज़ी है 

ज़िन्दगी कि बिसात पर
फैसले कोई और
करता है
वक़्त के धागे से
बंधा है
हर मोहरा
और डोर उसके हाथ में
जिस तरह हवा का
रुख बदलता है
कभी भी पलट सकता है
वो बाज़ी

और एक दिन 
हममे से हर एक को
देना पड़ेगा उसे
हर चाल का जवाब
तो अपनी चाल 
संभल कर चलना
क्योंकि 
गलत चाल कि सज़ा भी
गहरी होगी....

सिम्मी मैनी 

Sunday, 22 January 2012

रिश्ते को क्या नाम दें?.......


यह रचना मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि यह मैंने अपने माता पिता की  शादी की  ४४वीं वर्षगांठ के लिए लिखी है .....आज २२ जनवरी ,२००१२ को मैंने यह रचना लिखी ........ 
यह रचना मेरी और से उन्हें एक छोटी सी भेंट है -

रिश्ते को क्या नाम दें?

सब कहते हैं कि 
आज के खास दिन पर 
कुछ तो कहो
आप ही बताएं कि जीवन के 
४४ सालों को शब्दों में 
बाँधना आसन है क्या?

कहाँ से शुरू करूँ ?
जब से होश संभाला
आप दोनों को ऐसा ही पाया
कभी लड़ते झगड़ते 
तो कभी बतियाते 
कभी शिकायत करते
तो कभी मानते
ना कोई झूठ 
ना कोई दिखावा 
और मम्मी आज भी
इतने बड़े बच्चों को देती है
पापा के नाम का डरावा 
आज भी कहीं जाने से पहले
मम्मी पापा को
 धीरे बोलने का पाठ पढाती है 
पर आज भी पापा की 
ऊँची आवाज़ सुनने में आती है 

मम्मी आज भी पापा से  कहती है
मैं  तो बच्चों कि वजह से टिक गयी
कोई और होती  तो कभी ना रहती   
 यह तो मैं हूँ  जो सब  सह गयी 
कोई और होती  तो कभी ना सहती  
पर अगर आज भी हम  पापा को
 गलती से भी  कुछ कह दें  तो
मम्मी  आपे में ना रहती 

पापा आज भी मम्मी को
खूब दौडाते हैं
रात १२ बजे आज भी
बेसन का हलवा बनाते हैं
मम्मी से नज़रें चुरा कर
आज भी उन्होंने साथ कैसे निभाया
उसकी कहानी सुनाते हैं

मम्मी थक तो जाती है
पर फिर भी पापा का
पूरा साथ निभाती है
पापा आज भी कई बार
मम्मी पर भड़क जाते हैं
पर देखिये ना
आज भी मम्मी के बिना
 कही नहीं जाते हैं 

आज भी जब मम्मी
 गहरी नींद में होती है
तो बस पापा कि एक आवाज़
कृष्णा ...सुबह पेट साफ़ नहीं होता
गरम दूध का गिलास टाइम पे दिया कर 
मम्मी को जगाने के लिए काफी है

मैं   चाहती तो थी कि 
सुनहरे  शब्दों को 
प्यार कि चाशनी में घोल कर 
एक ऐसी कविता रच पाती 
जो आपको स्वपनलोक में ले जाती 
और बरबस ही आप के मुख से निकलता 
वाह! क्या रिश्ता है
पर ऐसा कर ना सकी
क्योंकि  
मैं  समझती हूँ
यह रिश्ता  ना तो  फ़िल्मी है 
और ना ही परफेक्ट
इतने सालों में मैंने तो बस इतना जाना कि 
 यह रिश्ता बरसों के साथ का है
हर सुख में और हर दुःख में
एक होने के  एहसास का  है 
शायद यह रिश्ता
ख़ूबियों  और खामियों का
अदभुत  संगम है
अब आप ही बताएं
इस रिश्ते को क्या नाम दें?

 सिम्मी मैनी 


Thursday, 12 January 2012

उम्मीद (expectation)

           उम्मीद  (expectation)

क्यों जुड़ जाती है उम्मीद?
जहाँ प्रेम होता है
क्यों गहरी होती है टीस?
जहाँ प्रेम होता है

कभी चाहा नहीं था उम्मीद
कि तुम मेरे दर पर आती
पर तुमने कब दबे पाँव 
दिल में घर कर लिया
पता ही नहीं चला


छीन लिए होशो हवास
और
लूट लिया दिल का चैन
खोल डाला पल भर में
लेन देन का बही खाता
और
पाई पाई का हिसाब
मांगने लगी तुम
कितना तन मन धन
किसे कब किया अर्पण
पहले कभी सोचा न था

कहते हैं
उम्मीद पर दुनिया कायम है
पर ऐ !उम्मीद
तुमने तो मेरा
सब कुछ लूट लिया
जब तक तुमसे
पहचान ना थी
तो जीना आसन था
और 
प्रेम रगों में बहता था
लहू के संग


जैसे ही तुम्हारी
 परछाई पड़ी मुझपर
मानो ख़ुशी को
ग्रहण लग गया
प्रेम हवा हो गया
बदले कि आग में
और
खून भी पानी बन गया

चलो निकलो बाहर
मेरे दिल से
कि मुझे तुम्हारी
ज़रुरत नहीं
तुमसे मिलने से पहले भी
मैं सिर्फ दिया करती थी
और अपनी नज़रों में
ऊँची उठ जाती थी
हाँ .....मुझे फिर से
वैसा ही बनना है

सिम्मी मैनी