Sunday, 11 January 2015

चाह

 
        चाह

मिट्टी से सने हाथों से
होले होले थपथपाती हूँ
इक पुतले को ,,,,
ताकि इसका रूप निखर सके
अब इसे गुज़ारना होगा
भट्टी की तपिश से
और फिर ये
 घर के किसी कोने की
शोभा बन जायेगा
जैसे तुमने मुझे
बड़े प्यार से गड़ा
और वक़्त की भट्टी में
झोंक दिया ,,,,
पर मैं अभी तुम्हारे
आंगन में सज ना सकी
क्योंकि शायद  अभी मेरा  ,,,
परिस्तिथियों की
आंच में तप कर
मज़बूत होना बाकी है
मुश्किल  तो है
इस आग से गुज़रना
पर
तुमसे मिलने की
चाह कुछ ऐसी है
की  अब
हर आग शीतल है
और हर परीक्षा खेल

सिम्मी मदन मैनी





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