दिल की बात
Sunday, 11 January 2015
उजाला
उजाला
मुझे कौन ढक सकता है भला
उजाला हूँ
अंधेरों को चीर कर
निकल आऊँगा
और रोशन हो जाएगी
पूरी कायनात
जैसे अंतर में
ज्ञान की एक किरण
फूटती है
और अस्तित्व
जगमगाने लगता है
सिमी मदन मैनी
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