Wednesday, 26 August 2015
Thursday, 6 August 2015
Saturday, 7 March 2015
अहंकार
काम, क्रोध , मोह , लोभ और अहंकार सभी बड़े परिचित शब्द हैं ,,,,,,कहते है काम ,क्रोध , लोभ ,और मोह पर विजय प्राप्त करना सरल तो नहीं परन्तु नामुमकिन भी नहीं ,,,,अभ्यास और वैराग्य द्वारा इन पर विजय प्राप्त की जा सकती है ,,,,,परन्तु अहंकार एक ऐसा दोष है जो हर व्यक्ति के मन में कहीं किसी कोने में घर कर के बैठा है ,,,,अहंकार इतना सूक्षम है कि मनुष्य को उसके होने का आभास तक नहीं होता ,,,,,,शक्तिशाली होने का , बुद्धिमान होने का , धनी होने का , रिश्तों का , सुंदरता का , किसी गुण विशेष का , भक्त होने का , स्वभाव से विनम्र होने का , संस्कारी होने का यह सभी अहंकार है ,,,,विनम्रता का अहंकार भी मनुष्य को पतन की और ले जाता है ,,,, जीवन में घटने वाली सभी घटनाएं एक ऐसा आईना हैं जिसमें हम अपने अहंकार के दर्शन कर सकते हैं ,,,,,,,,दिन में ना जाने कितनी बार हम मैं शब्द का प्रयोग करते हैं ,,,,,,कोई भी रिश्ता , ओहदा , गुण ,रूप , ज्ञान सदा साथ रहने वाला नहीं है ,,,,जिस क्षण हममें इनमें से किसी भी बात का अहंकार उत्पन्न होता है ,हम पतन की और अग्रसर होते हैं ,,, बरसों पुराने रिश्ते पल में कांच की तरह बिखर जाते हैं , राजा रंक हो जाता है ,शक्ति क्षीण हो जाती है , रूप और गुण धूल में मिल जाते हैं और ज्ञान धरा का धरा रह जाता है ,,,,,,जिस प्रकार माँ अपनी संतान का मल मूत्र साफ़ करती है उसी प्रकार परमात्मा भी हमारे जीवन में अलग अलग परिस्थितियों से हमारा सामना कराते हैं जिससे हमारे मन में बैठा अहंकार लुप्त हो सके ,,,,,परमात्मा पहले सब कुछ देता है और फिर एक पिता की भांति अपनी संतान को परखता है कि उसकी दी हुई नियामत का हम कैसा प्रयोग करते हैं ,,,,हर चीज़ जो दिखाई और सुनाई देती है वह पूरा सच नहीं है ,,,,,सच उससे पार है ,,,,,और अहंकार का पर्दा हटने पर ही उसे देखा और महसूस किया जा सकता है ,,,,,,यदि वह देखता है कि उसके दिए ख़ज़ाने का अहंकारवश हमने सही प्रयोग नहीं किया तो दाता किसी भी समय अपनी दात हमसे वापिस ले सकता है ,,,,,,,,वह कब शक्तिशाली को निर्बल , ज्ञानी को अज्ञानी और , धनी को निर्धन बना दे कौन जाने ?,,,,,,,हर पल अपने अहंकार से बात करना ज़रूरी है ताकि इतना भान तो रहे कि वह सिर्फ दूसरों में ही नहीं बल्कि मेरे भीतर भी रहता है ,,,,वह बात अलग है की हम देख सिर्फ दूसरों में पाते हैं ,,,,,,
सिमी मदन मैनी
Monday, 19 January 2015
कोई भी रिश्ता जब टूटने लगता है तो कमज़ोर व्यकि पूरी ज़िम्मेदारी सामने वाले पर डाल देता है ,,,,और समझदार व्यक्ति उसमें अपनी गलती को भी देखता है ,,,,,रिश्ते को जोड़ने का अर्थ बार बार किसी से दबना नहीं है परन्तु यह समझना है कि जो सामने वाले ने किया वह काम करने का तरीका गलत है ,,,,व्यक्ति गलत नहीं है ,,,,,,,,,रिश्ता जोड़ने का अर्थ कुछ भी सेहन करना नहीं है बल्कि समझदारी से परिस्थिति का सामना करना है ,,,,,,अपनी बात सामने रखना है ,,,,,ताली हमेशा दो हाथ से बजती है ,,,,,जब अहं आड़े आता है तो धन और रुतबे में मज़बूत से मज़बूत व्यक्ति भी बात करने की पहल नहीं करता ,,,,और बात बिगड़ जाती है ,,,,और जो व्यक्ति emotionally strong होता है वह बात करने की पहल करता है ,,,याद रहे जहाँ रिश्तों की भीख मांगनी पड़े उस रिश्ते की नीव कमज़ोर है ,,,,,रिश्ते की ज़रूरत जितनी आपको है उतनी ही सामने वाले को भी होनी चाहिए ,,,,,,,,,और अगर ऐसा नहीं है तो आप उसे अपना नहीं सामने वाले का नुक्सान समझिए ,,,,,,,आपको यह तसल्ली होनी चाहिए की कम से कम आपने पहल की ,,,,,यह आपकी ताकत है कमज़ोरी नहीं ,,,,,,,,,
सिमी मदन मैनी
सिमी मदन मैनी
Sunday, 11 January 2015
चाह
चाह
मिट्टी से सने हाथों सेहोले होले थपथपाती हूँ
इक पुतले को ,,,,
ताकि इसका रूप निखर सके
अब इसे गुज़ारना होगा
भट्टी की तपिश से
और फिर ये
घर के किसी कोने की
शोभा बन जायेगा
जैसे तुमने मुझे
बड़े प्यार से गड़ा
और वक़्त की भट्टी में
झोंक दिया ,,,,
पर मैं अभी तुम्हारे
आंगन में सज ना सकी
क्योंकि शायद अभी मेरा ,,,
परिस्तिथियों की
आंच में तप कर
मज़बूत होना बाकी है
मुश्किल तो है
इस आग से गुज़रना
पर
तुमसे मिलने की
चाह कुछ ऐसी है
की अब
हर आग शीतल है
और हर परीक्षा खेल
सिम्मी मदन मैनी
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