मेरे ख़्वाब
मेरे ख़्वाब यही कहीं
बिखरे पड़े हैं
कुछ छिपे हैं
परदे के पीछे
तो कुछ
चद्दर की सिलवटों में
सिमटे बैठे हैं
कुछ वहाँ छत के ऊपर
तार पर सूख रहे हैं
रंग बिरंगे से
हवा में लहराते
कुछ ख़्वाबों की तो अब
कोपलें फूटने लगी हैं
गमले में हर रोज़
आशा की खाद
और उम्मीद का पानी जो पड़ता है
अपनों के साथ की बहार
ख्वाबों की महक से
मेरा आँगन भर देती है
तो कई बार अपनों की बेरुखी से
शुष्क हो जाते हैं सपने
और सिकुड़ने लगते हैं
जैसे उनका अपना कोई
अस्तित्व ही ना हो
सालों से यह लुक्का छुपी का खेल
चल रहा है
मेरे और सपनो के बीच
कई बार धुंधले पड़ जाते हैं
झाड़ पोंछ की मिट्टी में
तो अचानक कभी
उफन कर गिर पड़ते हैं
चूल्हे पे चढ़े दूध के साथ
कभी कभी तो
संगमर्मर के फर्श में भी
चमकते दिखलाई पड़ते हैं
तो कभी खुले आसमान में
शरारत से टिमटिमाते हैं
कभी तो पा लेंगे अपनी मंज़िल
और उंचाईयों से झाँकते
मुझे मुस्कुरा कर कहेंगे
कि गर्व हैं उन्हें इस बात का
कि वो मेरी कोख से जन्मे है
सिम्मी मदन मैनी
मेरे ख़्वाब यही कहीं
बिखरे पड़े हैं
कुछ छिपे हैं
परदे के पीछे
तो कुछ
चद्दर की सिलवटों में
सिमटे बैठे हैं
कुछ वहाँ छत के ऊपर
तार पर सूख रहे हैं
रंग बिरंगे से
हवा में लहराते
कुछ ख़्वाबों की तो अब
कोपलें फूटने लगी हैं
गमले में हर रोज़
आशा की खाद
और उम्मीद का पानी जो पड़ता है
अपनों के साथ की बहार
ख्वाबों की महक से
मेरा आँगन भर देती है
तो कई बार अपनों की बेरुखी से
शुष्क हो जाते हैं सपने
और सिकुड़ने लगते हैं
जैसे उनका अपना कोई
अस्तित्व ही ना हो
सालों से यह लुक्का छुपी का खेल
चल रहा है
मेरे और सपनो के बीच
कई बार धुंधले पड़ जाते हैं
झाड़ पोंछ की मिट्टी में
तो अचानक कभी
उफन कर गिर पड़ते हैं
चूल्हे पे चढ़े दूध के साथ
कभी कभी तो
संगमर्मर के फर्श में भी
चमकते दिखलाई पड़ते हैं
तो कभी खुले आसमान में
शरारत से टिमटिमाते हैं
कभी तो पा लेंगे अपनी मंज़िल
और उंचाईयों से झाँकते
मुझे मुस्कुरा कर कहेंगे
कि गर्व हैं उन्हें इस बात का
कि वो मेरी कोख से जन्मे है
सिम्मी मदन मैनी