Sunday, 28 December 2014

जाते हुए लम्हे


 
 जाते हुए लम्हे

वक़्त के गहरे सागर से
चंद लम्हे मैंने भी चुराये थे
और गत वर्ष
 मेह्मान बना
दिल  में सजाये  थे
समय की इस बंद  पुड़िया में
कैसे लम्हे कैद  थे कौन जाने ?
जब किस्मत ने उम्मीद से 
बंद पुड़िया को खोला 
तो जाना कि  ,,,,
हर लम्हा कितना अलग
कोई गुनगुनाता
कोई मुस्कुराता
कोई उदास
कोई कठोर
कोई चंचल
कोई संपन्न
कोई कितना अपना
तो कोई परया
अब जो बीते लम्हे
वक़्त की गहराई में
समाने को हैं  तो
हर मेहमान को
ख़ुशी  ख़ुशी विदा करना  है
शुक्राना करना है हर उस बीते पल का
जो अपनी मौजूदगी से
मेरे  वजूद के विस्तृत आकाश पर
अनुभव और सीख के
 कुछ और सितारे  जोड़ गया

सिमी  मदन  मैनी
29.11.2014