जाते हुए लम्हे
वक़्त के गहरे सागर सेचंद लम्हे मैंने भी चुराये थे
और गत वर्ष
मेह्मान बना
दिल में सजाये थे
समय की इस बंद पुड़िया में
कैसे लम्हे कैद थे कौन जाने ?
जब किस्मत ने उम्मीद से
बंद पुड़िया को खोला
तो जाना कि ,,,,
हर लम्हा कितना अलगकोई गुनगुनाता
कोई मुस्कुराता
कोई उदास
कोई कठोर
कोई चंचल
कोई संपन्न
कोई कितना अपना
तो कोई परया
अब जो बीते लम्हे
वक़्त की गहराई में
समाने को हैं तो
हर मेहमान को
ख़ुशी ख़ुशी विदा करना है
शुक्राना करना है हर उस बीते पल का
जो अपनी मौजूदगी से
मेरे वजूद के विस्तृत आकाश पर
अनुभव और सीख के
कुछ और सितारे जोड़ गया
सिमी मदन मैनी
29.11.2014