पैंसिल - रबड़
मेरे हाथों में कर्मों कि पैंसिल
कागज़ पर दौड़ती
कई गलतियाँ करती
कभी छोटी तो कभी बड़ी
पर,,,,,,
रुक कर देखने का समय कहाँ?
इस अंधी दौड़ में
और,,,,,,,
जीवन के यह कहानी
घिसी हुई पैंसिल के साथ
यूँ ही बढती जाती
फिर,,,,
एक दिन जब टूटता
सिक्का इस पैंसिल का तो
होश उड़ जाते,,,,
और अपनी भूल नज़र आती
उफ्फ्फ्फ़!!!!
इतना काला कागज़ मेरे जीवन का
और इतनी साड़ी गलतियाँ?
क्या यह छोड़ कर जाऊँगी मैं?
नहीं! नहीं!,,,,,,
चलो पीछे चलती हूँ
ज्ञान का रबड़ लेकर
आज सभी सड़े गले संस्कारों,संकल्पों और सोच को
मिटा दूँगी ,,,
परमात्मा के दिए इस ज्ञान के रबड़ से
और फिर होगा हाथों में
एक साफ़ चमकता जिंदगी का नया कागज़
शुद संकल्पों के सिक्के से बनी कर्मों कि पैंसिल
अब चलेगी इस कागज़ पर
और इस ज़िन्दगी का इन्साफ कर जाएगी
सिम्मी मदन मैनी
07 sept 2012
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