मैं और चाँद
आज दिल ने फिर चाहा
छू लूं ,,,,
उस चाँद को
जो रोज़ रात मेरी छत पर
चमकता है
सफ़ेद दूधिया गेंद सा
शीतलता का प्रतीक
सुहागनों का भगवान
और,,,,,,,,,
बुझे दिलों को राहत देता
सुन्दर उर्जा स्रोत
मन कि सीढ़ी पर चढ़ कर
मैं पहुंची चाँद पर,,,,
उफ्फ़ !!!!!!!
तुम कितने विरान हो
ऊबड़ खाबड़ ,,,,
नज़रें तलाश रही है
तुम्हारी रोशनी की
एक किरण
पर तुम्हारी अपनी रोशनी कहाँ ?
ऐ !चाँद
तुम तो बिल्कुल मेरे जैसे हो
उसकी रहमत ही चमकाती है तुम्हे
और तुम इतना मान पाते हो
पल भर को सोचो ,,,,,,
अगर यह गृह
सूरज के चक्कर ना लगाते
तो तुम,,,,
किसकी रोशनी पा कर
खुद पर इतराते
और इतना मान पाते
शायद तुम और मैं दोनों ही
उसकी दया और प्रेम के बिना
इस ब्रह्माण्ड में
अनजान से कहीं खो जाते
अनजान से कहीं खो जाते
सिम्मी मैनी
15 august 2012
